अंतरिम बजट से आम चुनाव पर रहेगी नज़र, किसानों के लिए लुभावनी योजनायें लागू कर सकती है मोदी सरकार

एक फरवरी को मोदी सरकार का आखिरी बजट संसद में पेश होगा। इस बार अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल मोदी सरकार का पहला अंतरिम बजट पेश करेंगे। चुनावी साल में पेश होने वाले बजट में लोकलुभावन घोषणाएं होती हैं। ऐसे में यह बजट सरकार के साथ-साथ आम लोगों के लिए बेहद खास होगा। देश के कृषि क्षेत्र और किसानों की बात की जाए तो उसे भी प्रधानमंत्री मोदी के इस चुनावी बजट काफी उम्मीदें हैं।

अगर हम बात करें उस तबके की जिसके सहयोग के बिना किसी भी पार्टी का सत्ता में आना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है तो वह है – देश का किसान। आम चुनाव 2014 में बीजेपी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने वादा किया था और इसी वादे की बदौलत नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और अब उनके पांच साल का कार्यकाल भी पूरा होने जा रहा है लेकिन आज भी किसान तबके को अपनी आय दोगुनी होने का इन्तजार है।

लेकिन मौजूदा स्थिति में न तो पीएम मोदी द्वारा किसानों से किया वादा पूरा होता दिख रहा है और न ही उनके कार्यकाल का कोई सटीक दांव ही दिख रहा है, जिससे किसान उनको अपना हितैशी समझ सके। इस सबके पीछे जहां कुछ हद तक केन्द्र सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं वहीं बीते चार साल के दौरान तीन साल कमज़ोर मानसून और वैश्विक बाजार में खाद्यान उत्पादों की कीमतों का निचल स्तर होना भी जिम्मेदार है।

ऐसे में कर्ज माफी से इतर किसानों को मदद पहुंचाने वाली अन्य योजनाओं के घोषणाओं की उम्मीद बढ़ गई है। माना जा रहा है कि सरकार कम कीमतों पर फसल बेचने वाले किसानों को उनके नुकसान की भरपाई के लिए एक तय रकम देने की योजना की घोषणा कर सकती है। यह रकम सीधे किसानों के खाते में भेजी जाएगी। मतलब अगर किसान, फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होते हैं, तो उन्हें सब्सिडी देकर सहायता दी जाएगी।

इसके साथ ही सरकार किसानों के परिवार को बीज, खाद और कृषि उपकरणों की खरीद के लिए सालाना एक निश्चित रकम दिए जाने के विकल्पों पर विचार कर रही है। ओडिशा और तेलंगाना में ऐसी योजनाएं पहले से चलाई जा रही हैं। तेलंगाना में जहां छोटे और सीमांत किसानों को खरीफ और रबी सीजन में प्रति एकड़ 4000 रुपये की मदद दी जाती है वहीं ओडिशा में सभी भूमिधारकों और भूमिहीन किसानों को सालाना 10,000 रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है। यह रकम किसानों को खाद, बीज और कृषि उपकरणों की खरीद के लिए दी जाती है।

किसानों के लिए बाजार के सामने लेवल प्लेइंग माहौल बनाए। अभी भी APMC मंडी सिर्फ उन्हीं के लिए हैं जो लाइसेंस धारक कारोबारी या बिचौलिए होते हैं। सरकार को कम से कम 50% लाइसेंस और दुकानें कृषक समूहों और कोऑपरेटिव ग्रुप को देने की पक्की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे किसानों को बाजार में बराबरी का मौका मिलेगा।

सरकार को किसानों के लिए वेयरहाउस बनाने पर फोकस करना होगा। शहरों के पास नेशनल हाइवे पर 50 किमी की दूरी पर कम से कम एक वेयर हाउस का लक्ष्य होना चाहिए। इससे खाद्यानों की बर्बादी कम होगी और खाद्य महंगाई भी काबू में रहेगी। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी को कम से कम पांच उत्पादों के लिए इंटेलीजेंस डिपार्टमेंट बनाना होगा। यूनिवर्सिटी को उन क्षेत्रों के कैचमेंट एरिया के हिसाब से मिट्टी और पानी का मैप बनाना चाहिए।

सरकार को अपनी इंपोर्ट और एक्सपोर्ट पॉलिसी किसानों को ध्यान में रखते हुए बनाना चाहिए। अगर दुनियाभर के बाजारों में किसी प्रोडक्ट की कीमतें गिरती हैं तो भी सरकार को ऐसी व्यवस्था बनाना चाहिए कि किसानों पर इसका प्रभाव न पड़े। अगर सरकार इन बातों को ध्यान में रखते हुए बजट में कुछ प्रावधान लाती है तो इससे किसान की आय बढ़ेगी, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजदार पैदा होंगे। साथ ही लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा बढ़ेगी और खाद्य महंगाई काबू में रहेगी। अगर सरकार ये कदम उठाना चाहती है तो ये काम करने के लिए कोई कानूनी रोड़े नहीं है। इस बजट में मोदी सरकार को अपना ब्लूप्रिंट देना होगा और इन क्षेत्रों में फंड वितरित करना होगा।

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