अगली सरकार बनने तक बैंकों के लिए किसी प्रकार का नया पुनर्पूजीकरण नहीं हो सकता

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अपनी विनियामक व संवृद्धि संबंधी पूंजी की जरूरतों के लिए खुद पूंजी जुटानी होगी क्योंकि अगली सरकार बनने तक बैंकों के लिए किसी प्रकार का नया पुनर्पूजीकरण नहीं हो सकता है. यह बात शुक्रवार को आधिकारिक सूत्रों ने बताई.वित्त मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सरकार ने किसी प्रकार आखिरी आकस्मिक के लिए बफर के तौर पर करीब 5,000 करोड़ रुपये की रकम रखी है, क्योंकि बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक की विलयित संस्था में रकम डालने की संभावना है.
जनवरी में सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूजीकरण के लिए 41,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि की मंजूरी संसद से मिली थी. पहले से ही 65,000 करोड़ रुपये के बजट को मिलाकर कुल पुनर्पूजीकरण का पैकेज चालू वित्त वर्ष में 1,06,000 करोड़ रुपये का हो चुका है. अंतरिम बजट 2019-20 में सरकार ने बैंक के पूंजी के लिए धन प्रदान नहीं किया है.
सूत्रों ने बताया कि बैंकों को साख वृद्धि को प्रोत्साहन देने के लिए धन की आवश्यकता हो सकती है और वे बाजार से पूंजी जुटा सकता है या जुलाई में पूर्ण बजट आने का इंतजार कर सकता है.सरकार ने फरवरी में 12 पीएसबी के लिए 48,239 करोड़ रुपये के पुनर्पूजीकरण बांड को मंजूरी प्रदान की थी.नवीनतम पुनर्पूजीकरण बांड की मुख्य रूप से चार श्रेणियां हैं- खराब कर्ज से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) फ्रेमवर्क के तहत बेहतर प्रदर्शन करने वाले बैंक, गैर-पीसीए बैंक जो पीसीए के तहत जाने के करीब हैं, पीसीए से बाहर निकले हुए बैंक और पीसीए बैंक जिन्हें न्यूनतम विनियामक पूंजी मानकों को पूरा करने की आवश्यकता है.
इलाहाबाद बैंक और कॉरपोरेशन बैंक पहले ही पीसीए से बाहर हो चुके हैं.गैर-पीसीए बैंकों में पंजाब नेशनल बैंक, यूनियन बैंक, सिंडिकेट बैंक और आंध्रा बैंक शामिल हैं.पीसीए से बाहर होने वाले बैंक जिन्हें पीसीए से बाहर रहने के लिए मदद की जरूरत है उनमें बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ महाराष्ट्र आते हैं.सेंट्रल बैंक, यूनाइटेड बैंक, यूको बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक पीसीए बैंक हैं जिन्हें न्यूनतम विनियामक पूंजी मानकों को पूरा करने के लिए मदद की आवश्यकता है.

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