जानकी नवमी: 16 महान दानों का फल, बच्चों को दान करें फल

पौराणिक मतानुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्याह्न काल में जब महाराजा जनक संतान प्राप्ति की कामना से यज्ञ भूमि तैयार करने के लिए हल से भूमि जोत रहे थे, उसी समय पृथ्वी से एक बालिका का प्राकट्य हुआ।

जोती हुई भूमि तथा हल के नोक को भी ‘सीता’ कहा जाता है, इसलिए बालिका का नाम ‘सीता’ रखा गया। राजा जनक ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया, इसी कारण उनका नाम ‘जानकी’ पड़ा। अत: इस पर्व को ‘जानकी नवमी’ भी कहते हैं।

देवी सीता मां लक्ष्मी का ही अवतार हैं। देवी सीता की उत्पत्ति भूमि से हुई थी, इस कारण उन्हें वसुंधरा भी कहते हैं। युवा होने पर देवी सीता का विवाह श्रीराम के साथ हुआ। वाल्मीकि रामायण आदि शास्त्रों में देवी सीता के स्वरूप का विस्तार से वर्णन है। ऋग्वेद में एक स्तुति में कहा गया है कि असुरों का नाश करने वाली सीता आप हमारा कल्याण करें।

रामचरितमानस में देवी सीता को संसार की उत्पत्ति, पालन व संहार करने वाली लक्ष्मी कहा गया है। देवी सीता शक्ति, इच्छा-शक्ति व ज्ञान-शक्ति तीनों रूपों में प्रकट होती हैं, अतः वे परमात्मा की शक्ति स्वरूपा हैं। मान्यतानुसार इस दिन सीताराम के निमित विधिवत पूजन, व्रत व उपाय से 16 महान दानों का फल, पृथ्वी दान का फल तथा समस्त तीर्थों के दर्शन का फल मिल जाता है तथा जीवनसाथी को लंबी आयु प्रदान होती है, विवाह से विलंब दूर होता है, सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

विशेष पूजन विधि: घर की पूर्व दिशा में लाल कपड़ा बिछाकर राम-सीता अथवा राम दरबार का चित्र स्थापित कर विधिवत पंचोपचार पूजन करें। सिंदूर मिले घी का दीप करें, सुगंधित धूप करें। सिंदूर से तिलक करें। लाल फूल चढ़ाएं, कद्दू के हलवे का भोग लगाएं। किसी माला से इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें। पूजन के बाद भोग पीली आभा लिए गाय को खिलाएं।

पूजन मुहूर्त: दिन 11:30 से दिन 12:30 तक है।
पूजन मंत्र: श्रीं सीता-रामाय नमः॥

उपाय

  • सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए सीता-राम पर चढ़े 12 गोल फल बच्चों में बांटें।
  • जीवनसाथी की लंबी आयु के लिए देवी सीता पर चढ़े 7 केले गाय को खिलाएं।
  • विवाह से विलंब दूर करने के लिए सीताराम के मंदिर में सुगंधित घी के 7 दीपक करें।
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