आज है 30 करोड़ की कंपनी का मालिक, सड़कों पर बर्फ के गोले बेचकर किया गुजारा

कहते हैं हौसले बुलंद हों, तो कुछ भी असंभव नहीं। कारोबारी उत्तमचंद तारवानी के साथ कुछ ऐसा ही मामला है। बचपन करी-लड्डू बेचते हुए गुजरा।

10 साल की उम्र में सिर से पिता का साया चला गया। घर की जिम्मेदारी खुद के कंधों पर आ गई। लेकिन तारवानी ने कभी हार नहीं माना। वे इन तमाम मुश्किलों से लड़ते हुए आगे बढ़ते गए। आज तारवानी चार फैक्टरी के मालिक हैं। जिसका टर्नओवर 30 करोड़ रुपए है।

उत्तमचंद्र अपनी कामयाबी का श्रेय कड़ी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति को देते हैं। संघर्ष भरे दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं, 10 साल का था जब पिता हमें छोड़कर चले गए। मुझसे बड़े और भी भाई-बहन थे, लेकिन घर की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। बात 1977 की है। घर की माली हालत ठीक नहीं थी। मैंने पैदल घूम-घूमकर करी-लड्डू बेचना शुरू किया। दिनभर मेहनत के बाद केवल 5रु ही जुटा पाता था।

घर के लिए पैसे पूरे नहीं होने की वजह से ठेले पर बर्फ का गोला भी बेचता था। इसके अलावा साइकिल से दुकानों व ऑफिस जाकर टिफिन तक बांटने का काम किया। उत्तमचंद्र बताते हैं, इस दौरान कई बार उन्हें भूखे तक सोना पड़ा था। लेकिन दुखी होकर वे कभी रोए नहीं। बस मेहनत करते रहे।

फिर साबुन की फैक्टरी में जॉब लगी
15 की उम्र में उत्तमचंद ने एक साबुन की फैक्टरी में काम किया। यहां उन्हें मालिक खूब डांटता-फटकारता था। इसके अलावा उन्हें मजदूरी भी कम मिलती थी। यहीं से खुद की कंपनी का मालिक बनने का सफर शुरू हुआ। उत्तमचंद ने ठान लिया कि खुद की फैक्टरी शुरू करेंगे। जहां नेचुरल ऑयल से साबुन बनाने का बिजनेस करेंगे।

1995 में उधारी लेकर एक कमरे में छोटा-सा प्लांट डाला और साबुन बनाना शुरू कर दिया। तब वे अकेले ही सारा काम करते थे। इसमें साबुन बनाने से लेकर पैकिंग, सप्लाई और मार्केट में पैसों की वसूली तक शामिल है। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी। आज उत्तमचंद 4 फैक्टरी के मालिक हैं।

साउथ से लेकर बंगाल तक में होती है इनके साबुन की सप्लाई
आज इनकी फैक्टरी में बनने वाली साबुन की सप्लीई छत्तीसगढ़ के अलावा साउथ इंडिया और वेस्ट बंगाल में भी होती है। दिलचस्प बात यह है कि हर मजदूर इनकी फैक्टरी में काम करना चाहता है। दरअसल, उत्तमचंद अपने मजदूरों को गवर्नमेंट लेबर रेट से ज्यादा भुगतान करते हैं। उत्तमचंद बताते हैं, मैंने इस दर्द को बेहद करीब से महसूस किया है, जब लोग मजबूरी का फायदा उठाकर कम पैसे देकर ज्यादा काम कराते हैं। यही वजह है कि उत्तमचंद को मजदूर अपना मसीहा बताते हैं।

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