ताज की जगह लेने को तैयार है ये भारत का नया अजूबा, बनाने में लग गए 113 साल

आगरा अभी तक प्रेम के प्रतीक ताजमहल के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब आगरा में ही ताजमहल के जैसी भव्य इमारत बनकर तैयार हो गई है। दरअसल आगरा के स्वामीबाग में पिछले 113 साल से बन रहा दयालबाग मंदिर आखिरकार बनकर तैयार हो गया है। इस मंदिर को बनाने का काम पिछले 113 साल से चल रहा है। इस मंदिर को राधा स्वामी सत्संग के गुरू बना रहे है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत तो यही है कि इसे बनाने में ही 113 साल लग गये, क्यों इस मंदिर पर की जाने वाले नक्काशी और कारीगर हटके है। मंदिर के गुम्बद पर की कई कलाकारी को बड़े ही मसीन तरीके से बनाया गया। कयास लगाए जा रहे है कि साल के अंत तक इस मंदिर के पट खोल दिए जाएंगे।
इस खास मंदिर की बनाने में मजदूरों, कलाकारों की कई पीढ़ियां काम कर चुकी है तब जाकर इस अद्भूत मंदिर को तैयार किया गया है। राधा स्वामी के अधिकारी का कहना है कि जल्द ही मंदिर का उद्धाटन किया जाएगा। मंदिर के इतिहास के बारें में बात करें तो ये कहानी भी काफी दिलचस्प है मंदिर के अधिकारियों का कहना है कि स्वामी शिवदयाल सिंह ने 1861 में इस मंदिर को बनाने का सुझाव दिया था। इनका मानना था कि आगरा की यही धरती है जहां पर एक मंदिर बनाया जाएं। क्योकि 1861 में आगरा के स्वामीबाग में जंगल ही जगंल था और यहां कि मिट्टी सबसे ज्यादा उपजाऊ थी। साथ ही यहां मीठे पानी की झील भी मौजूद थी जिसके बाद स्वामी शिवदयाल ने यहां मंदिर बनाने का फैसला लिया था।
राधास्वामी मंदिर के मुख्य एंट्रेंस गेट में पांच द्वार दिए गए है। एक मुख्य गेट के बीच में दो दाई तरफ एवं दो बायं तरफ गेट बनाए गए है। बता दे कि राधास्वामी मत से दुनिया भर के लाखों अनुयायी जुड़े है। इस मंदिर के डिजाइन ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी है। इसका डिजाइन काफी यूनिक है। साथ ही मंदिर के मुख्य गुम्बद में 193 फीट के पिलर का इस्तेमाल गया है। मंदिर का ज्यादातर हिस्सा मार्बल का बना है जिसमें लाल, हरे, पीले रंग के पत्थरों से नक्काशी की गई है। इस मंदिर का बजट 50 लाख रखा गया था।
इस मंदिर को बनाने के लिए 100 मजदूरों और कुछ इंजीनियर ने काम किया। मजदूरों ने मंदिर की नक्काशी के लिए विदेशी टूल का भी इस्तेमाल किया। स्वामी बाग मंदिर के सिक्योरिटी गार्ड का कहना है कि मंदिर के इतने समय तक बनने की एक वजह रही। शुरूआत में मार्बल पर नक्काशी का काम मजदूर अपने हाथों से कर रहे थे वो भी बिना किसी टूल के। जिसकी वजह से डिजाइन में फर्क आ गया। बाद में मजदूरों के लिए मशीने मंगवाई गई। जिसके बाद फिर से इस काम को शुरू किया गया।
Facebook Comments