करुणानिधि के काले चश्मे की कहानी, जब अचानक बदल दिया

तमिलनाडु की राजनीति का एक बड़ा स्तंभ माने जानेवाले मुथिवल करुणानिधि दुनिया को अलविदा कह गए और अपने पीछे छोड़ गए ऐसा इतिहास, जिसे राज्य कभी भुला नहीं पाएगा। दरअसल, जब उन्होंने साल 2006 में राज्य के सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री के तौर पर पदभार संभाला था तब यह बात सभी को पता चल गई थी कि ‘कलाईनार’ को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता।

मृत्यु से पहले एक साल तक करुणानिधि एक खास काला चश्मा पहनकर चला करते थे। इस चश्मे के साथ करुणानिधि का सफर कुल 46 साल तक चला। एक लेखक, कवि, राजनेता और फिर दक्षिण भारतीय सियासत की सबसे मजबूत शख्सियत बनने वाले करुणानिधि ने 94 साल की उम्र में अपने इस चश्मे को अलविदा कहते हुए जर्मनी से इंपोर्टेड नए चश्मे को इसकी जगह दे दी।

साल 2017 में करुणानिधि ने चश्मा बदलने का फैसला लिया तो चेन्नै के मशहूर विजय ऑप्टिकल्स ने नए फ्रेम के लिए सारे देश में खोज शुरू की। 40 दिन की खोज के बाद जर्मनी से नया चश्मा मंगाया गया। इस नए चश्मे का फ्रेम हल्का था और इसने ही करुणानिधि के 46 साल पुराने चश्मे की जगह ली। हालांकि नया फ्रेम पुराने चश्मे के साथ करुणानिधि की सियासी जिंदगी का ज्यादा सफर नहीं काट सका।

भगवान राम के अस्तित्व पर उठा दिए सवाल
साल 2007 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के वक्त राम सेतु का मुद्दा संसद की चर्चा का विषय बना हुआ था। देश भर में राम सेतु को लेकर बहस का दौर जारी था। इसी बीच करुणानिधि के एक बयान ने देश की सियासत में विवाद की एक नई वजह पैदा कर दी। देश भर में राम सेतु को लेकर जारी चर्चा के बीच करुणानिधि ने सवाल करते हुए कहा कि 17 साल पहले एक आदमी के बनाए पुल को ना तोड़ने की बात कही जा रही है। राम कौन थे और उनके होने के सबूत कहां हैं? करुणानिधि के इस बयान पर देश भर में विरोध का दौर शुरू हो गया था, लेकिन करुणानिधि जानते थे कि तमिलनाडु की सियासत के ध्रुव क्या हैं, इसलिए उन्हें इससे अधिक प्रभाव भी नहीं पड़ा।

सियासत से दूर तो हुए लेकिन कभी अलविदा नहीं कहा
करुणानिधि 33 साल की उम्र में साल 1957 में उन्होंने पहली बार कुलीथलाई सीट से जीत हासिल कर तमिलनाडु विधानसभा में कदम रखा। साल 1969 में अन्नादुराई के निधन के बाद वह पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उसके बाद तमाम उतार-चढ़ावों के बीच 1971-76, 1989-91, 1996-2001 और 2006-11 के दौरान पांच बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। साल 2016 में अपने बेटे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर उन्होंने सक्रिय राजनीति से किनारा तो किया लेकिन अलविदा नहीं कहा।

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