भारत में दिया था पहला आरक्षण वो भी आजादी से कई सालों पहले,आंबेडकर नहीं, इस शख्स ने…..

आरक्षण के विरोध में आज भारत बंद बुलाया गया है। कुछ जाति वर्ग के लोग आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। आरक्षण को लेकर हमेशा से बहस से छिड़ी रहती है।

आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर भारत में आरक्षण की शुरुआत कब से हुई थी और कब-कब कैसे-कैसे बदलाव इसे लेकर हुए हैं।

बता दें भारत में आरक्षण की व्यवस्था आजादी के बाद से नहीं बल्कि आजादी से पहले से थी। आजादी से 45 साल पहले ही भारत में किसी विशेष जाति वर्ग को कुछ खास फायदा देने की शुरुआत यानी आरक्षण की शुरुआत हो गई थी।

 

1901-02- महाराष्ट्र के रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज की ओर से आरक्षण की शुरू की थी। इस दौरान महाराज ने समान आधार पर अवसर मिलने के लिए काम किए। साथ ही वंचित समुदाय के लिए नौकरियों में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई। बताया जाता है कि आरक्षण को लेकर यह पहला राजकीय आदेश था।

उसके बाद 1908 में अंग्रेजों ने भी प्रशासन में कम हिस्सेदारी वाली जातियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए। हालांकि 1901 से पहले 1882 में हंटर आयोग की नियुक्ति हुई थी, जिसमें महात्मा ज्योतिराव फुले ने नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण-प्रतिनिधित्व की मांग की। साथ ही 1891 में भी सामंती रियासत ने इसकी मांग की थी।

 

1909 – भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण का प्रावधान किया गया और इसमें कई बदलाव किए गए थे। उसके बाद ब्रिटिश सरकार ने अलग अलग धर्म और जाति के लिए कम्यूनल अवार्ड की भी शुरुआत की थी।

उसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की बीच पूना पैक्ट हुआ। पूना पैक्ट महात्मा गांधी और डॉ। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर बीच पूणे की यरवदा सेंट्रल जेल में 24 सितम्बर 1932 को हुआ था। पूना समझौता वो था जिसने एक बड़ें शोषित वर्ग को प्रभावित किया था। ब्रिटिश सरकार की ओर से कुछ सीटों को वंचित वर्ग के लिए आरक्षित किया गया। इससे दो कुछ वर्गों को दो वोट का अधिकार मिला था। जिसका गांधी जी ने भी विरोध किया था।

1942 – बी आर अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की। उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की।

1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के लिए कई फैसले लिए गए। उसके बाद 1953 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग को स्थापित किया गया। इसकी रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचियों में संशोधन किया गया।

1979- सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित किया गया। 1980 में आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए 22 फीसदी से 49.5 फीसदी वृद्धि करने की सिफारिश की।

 

1990- मंडल आयोग की सिफारिशों को विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया। इसका भारी विरोध हुआ और बाद में 1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10 फीसदी आरक्षण शुरू किया।

बता दें कि इसके बाद से लगातार आरक्षण संबंधी नियमों में लगातार बदलाव होते रहते हैं।

 

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