अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखी थी ये कविता, जब मौत को सामने खड़ा देखा था : अलविदा अटल

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी गुरुवार को दुनिया के अलविदा कह गए। 93 साल की उम्र में उन्होंने दिल्ली के एम्स अस्पताल में आखिरी सांस ली। अटल बिहारी वाजपेयी जितने कद्दावर नेता थे, उतने ही बेहतरीन कवि भी थे। उनकी एक कविता ‘मौत से ठन गई’ ने लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी है। ये कविता पढ़कर आप महसूस कर सकते हैं, जब व्यक्ति मौत के सामने होता है, तो कैसे उसे हराना चाहता है।

दरअसल इस कविता के पीछे एक मशहूर किस्सा भी है। ये कविता अटल विहारी वाजपेयी जी ने 1988 में तब लिखी थी, जब वो किडनी का इलाज कराने अमेरिका गए हुए थे। तब उन्होंने धर्मवीर भारती जी को खत लिखा था, जिसमें ये कविता लिखी हुई थी। उन्होंने मौत को अपने सामने देखकर उसे हराने के जज्बे को कविता के रूप में सजाया था।

मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

Facebook Comments