जी हां ! बस्तर में अब कम ही होता है इस प्राकृतिक संसाधन का उपयोग

यह लौकी देशी होती है. हायब्रीड लौकी से तुम्बा नहीं बन पाता है. उस लौकी में एक छोटा सा छिद्र किया जाता है फिर उसको आग में गर्म कर उसके अन्दर का सारा गुदा छिद्र से बाहर निकाल लिया जाता है.

आज के इस आधुनिक जमाने में हम प्रकृति से बनी वस्तुओं का कम ही उपयोग कर पाते हैं. मध्य प्रदेश का बस्तर जिला आदिवासी बहुल इलाका है और यहां के आदिवासी प्रकति के साथ मेल-मिलाप बनाकर ही रहते है.

बस्तर के आदिवासी काफी समय पहले से अपने दैनिक जीवन में तुम्बा का उपयोग करते आये हैं. दरअसल तुम्बा का प्रयोग पेय पदार्थ रखने के लिए ही किया जाता है. इसमेंं रखे हुए पानी पर वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता है. इसलिए इसे देशी थर्मस,बस्तरिया थर्मस भी कहा जाता है. तुम्बा में यदि सुबह ठंडा पानी डाला जाए तो वह पानी शाम तक वैसे ही ठंडा रहता है. पानी पर तापमान का कोई फर्क नहीं पड़ता है और तुम्बा पानी को भी स्वादिष्ट बना देता है.

तुम्बा लौकी से बनता है. इसको बनाने के लिये सबसे गोल मटोल लौकी को चुना जाता है जिसका आकार लगभग सुराही की तरह हो.जिसका पेट गोल एवं बडा और मुंह वाला हिस्सा लम्बा पतला गर्दन युक्त हो. यह लौकी देशी होती है. हायब्रीड लौकी से तुम्बा नहीं बन पाता है. उस लौकी में एक छोटा सा छिद्र किया जाता है फिर उसको आग में गर्म कर उसके अन्दर का सारा गुदा छिद्र से बाहर निकाल लिया जाता है.

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