अरहर के बौने पौधों से ज्यादा उपज ले सकेंगे किसान, BHU के वैज्ञानिक ने विकसित की प्रजाति

किसान अब अरहर के बौने पौधों से ज्यादा उपज ले सकेंगे। बीएचयू कृषि विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक ने अरहर की ऐसी प्रजाति विकसित की है जो देखने में चने व मिर्च के पौधे जैसी होगी। इसकी ऊंचाई करीब 60 सेंटीमीटर होगी। पौधे में शाखाएं और फलियां ज्यादा होंगी। बीएचयू में इसकी खेती शुरू कर दी गई है।

एक हेक्टेयर में महज 8 से दस किलो बीज लगेगा

इस पौधे को तैयार करने वाले बीएचयू कृषि विज्ञान संस्थान के जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रिडिंग विभाग के वैज्ञानिक प्रो. महेंद्र नारायण सिंह के मुताबिक एक हेक्टेयर में महज आठ से दस किलो बीज लगेगा। बौनी प्रजाति होने से देखरेख और दवा के छिड़काव के दौरान पौधों के टूटने का खतरा नहीं होता। पुरानी प्रजातियों का एक हेक्टेयर में 20 से 25 किलो बीज लगता है।

कम क्षेत्र में ज्यादा पैदावार

अरहर का नया पौधा छोटा होने के कारण कम क्षेत्रफल में बेहतर और ज्यादा उत्पादन देता है। अरहर की इस प्रजाति को आशा मालवीय 406 नाम दिया गया है। यह अरहर की बौनी प्रजातियों में सबसे छोटी है। आंधी व पानी से इस प्रजाति को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता। इसके फूल नहीं गिरते जिससे फलियां ज्यादा लगती हैं।

पौधे को और छोटा करने के लिए शोध जारी 

प्रो. महेंद्र नारायण सिंह ने बताया कि अरहर के इस पौधे को और छोटा करने का प्रयास किया जा रहा है। इस पर शोध चल रहा है ताकि इसे 30 सेंटीमीटर तक किया जा सके। दरअसल चने व मिर्च की लंबाई अधिकतम 30 से 40 सेंटीमीटर होती है।

कम निकलता है अपशिष्ट 

पौधों में कई रोगों की प्रतिरोधी क्षमता विकसित की गई है। खासियत यह कि सामान्य अरहर के फसल व पौधे में जितना अपशिष्ट निकलता है उसका 40 फीसदी अपशिष्ट निकलता है। इससे मिट्टी का पोषण व्यर्थ नहीं होता।

दलहन के निर्यात की स्थिति

नई प्रजातियों व अनुकूल वातावरण के चलते उत्पादन बढ़ा है। सालाना 24 मीलियन टन से ज्यादा दलहन का उत्पादन हो रहा है जो उपभोग से अधिक है। इससे किसान अब दलहन के निर्यात की स्थिति में हैं।

बलुई व दोमट मिट्टी में बेहतर उत्पादन: महेंद्र

कृषि विज्ञानी प्रो. महेंद्र नारायण सिंह के मुताबकि अरहर की बौनी प्रजाति का उत्पादन बलुई व दोमट मिट्टी में किया जा सकता है। एक हेक्टेयर में करीब 20 किलोग्राम बीज की खपत होती है। जबकि उत्पादन 35 से 40 कुंतल होता है। पौध में फूल लगने के दौरान केवल एक बार डॉक्साकार्ब व स्पाइनोसेंड दवा का छिड़काव किया जाता है।

चुनौतियां

– अरहर की पूर्व प्रजातियों में उत्पादन कम व समय ज्यादा लगता था।

–  फसल में रोग प्रतिरोधी क्षमता कम होने से बीमारियों का प्रकोप था।

– लागत मूल्य निकालना मुश्किल था, किसान इसे बोने से बचते थे।

– फसल को प्रकृति के प्रकोप संग कीटों का हमला झेलना पड़ता था।

खास बातें

– एक हेक्टेयर में करीब 40 क्विंटल की हो रही पैदावार

– रोग प्रतिरोधी क्षमता वाली इस प्रजाति को हवा बारिश से कम क्षति

– पौध में शाखाओं की संख्या ज्यादा होने से फली भी अधिक लगती है

– अरहर की 60 सेंटीमीटर उंचाई बनाने में सफल हुए कृषि विज्ञानी

इसलिए है पहले से बेहतर

– पहले दलहन की फसल तैयार होने में औसतन नौ माह लगते थे

– आशा मालवीय 406 से फसल साढ़े सात माह में ही तैयार होगी

– पहले की फसलों का एक हेक्टयेर में 25-3 क्विंटल ही उत्पादन होता था

– आशा मालवीय 406 से एक हेक्टयेर में औसतन उत्पादन 4 क्विंटल होगा

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