CBI : सीबीआई चीफ आलोक वर्मा केस में सुनवाई पूरी, सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई में मचे घमासान पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई पूरी हो चुकी है।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ पिछले महीने से ही इस पूरे मामले की सुनवाई कर रही है। जजों की पीठ ने सरकार से पूछा कि आपको आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के लिए सेलेक्शन कमिटी से सलाह लेने में क्या दिक्कत थी। जजों ने कहा कि यह पूरी तरह से उचित नहीं है। सरकार के किसी भी कार्रवाई का आशय शासन के लिए ठीक होना होता है।

सेलेक्शन कमिटी में प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और नेता प्रतिपक्ष या विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता होते हैं। आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि उनके दो साल के तय कार्यकालल को सेलेक्शन कमिटी की सलाह के बिना खत्म नहीं किया जा सकता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेलेक्शन कमिटी से सलाह नहीं लेने से अच्छा, सलाह लेना।

CBI

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली जजों की पीठ ने कहा कि यह कानून के पालन भर का सवाल नहीं है लेकिन कानून के बेहतर पालन का सवाल है। यहां तक कि यदि जरुरत होती है तो क्या किसी कमिटी से किसी स्टेज पर सलाह नहीं ली जा सकती। अदालत ने पूरी सुनवाई में सरकार के पक्ष पर भी संदेह जताया कि आसाधारण परिस्थिति में यह कार्रवाई आवश्यक थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि केंद्र सरकार और सीवीसी इस मामले की जुलाई तक झेलती रही, तब उसने सेलेक्शन कमिटी से संपर्क क्यों नहीं किया। इससे पता चलता है कि वर्मा को रातोंरात छुट्टी पर नहीं भेजा गया बल्कि यह अक्टूबर में तय कर लिया गया था। इस मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई गोगोई ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि आखिर ऐसा क्या हो गया था कि सरकार को 23 अक्टूबर को आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने का फैसला लेना पड़ा।

सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि असाधारण परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी। सीवीसी का आदेश बिल्कुल पक्षपाती नहीं था सीबीआई के दो सबसे वरिष्ठ अधिकारी आपस में लड़ रहे थे और बजाय गंभीर केसों पर ध्यान देने के वो एक दूसरे के खिलाफ ही मामलों को जांच कर रहे थे। अगर सीवीसी अपना काम नहीं करता तो अपने कर्तव्य का निर्वाह न करना होता।

Facebook Comments