दिल्ली-एनसीआर में चलती है 21 आउटलेट, एक चार्टर्ड अकाउंटेंट बना चायवाला, एक महीने की कमाई 50लाख

उनके चायवाले की कहानी साल 2013 में शुरू होती है। जब उन्होंने 20 लाख रुपए के निवेश से दक्षिणी दिल्ली के मालवीय नगर में चाय की दुकान खोली। उन्होंने नौकरी से बचे पैसों का निवेश किया। इसमे दो दोस्तों अतीत कुमार और सीए असद खान से मदद ली। सबसे पहले उन्होंने अप्रैल 2012 में शिवांता एग्रो फ़ूड्स नामक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई। वे खुद कंपनी के सीईओ थे। असद ऑपरेशन प्रमुख थे और अतीत मार्केटिंग प्रमुख।

रॉबिन कहते हैं खुद का कुछ शुरू करने का विचार अर्न्स्ट ऐंड यंग में काम करते वक्‍त आया। मैंने ख़ुद से पूछा, क्या मैं कुछ करना चाहता हूं?  उन्होंने दोस्तों के साथ बिजनेस आइडिया पर विचार किया और चाय से जुड़ा काम करना तय किया। उनके पिता नरेंद्र झा इस आइडिया के खिलाफ थे। उन्हें इस काम में सफलता मिलने को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन आखिर वो मान गए। तैयारियों के रूप में रॉबिन ने कॉफी बाजार से जुड़ी डिमांड और सप्लाई पर कई रिपोर्टे पढ़ीं। उन्होंने पाया कि 85-90 प्रतिशत भारतीय चाय पीते हैं और यह संख्या खासी बड़ी है। चाय के साथ उन्होंने कई तरह के स्नैक भी जोड़ दिए।

उन्होंने चाय बागानों से संपर्क किया और दिल्ली के विभिन्न कैफे में चाय के विशेषज्ञ लोगों से मिले। फिर उन्होंने कारोबार बढ़ाने में देरी नहीं की। साल 2013 में मालवीय नगर मे टीपॉट आउटलेट को खोल लिया। शुरुआत में 10 स्‍थायी कर्मचारी थे। वो 25 तरह की चाय और जलपान सर्व करते थे। रॉबिन ने बीकॉम की शुरुआत दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से की लेकिन ग्रैजुएशन पूरा करने के लिए कॉरेसपांडेंस का रुख किया। साथ ही वो चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई भी करते रहे।

वो बताते हैं कि शुरुआत में उनका इरादा टीपॉट की चेन शुरू करने का नहीं था। टीपॉट की कामयाबी को लेकर उन्हें पूरा विश्वास नहीं था, इसलिए उन्होंने ईएंडवाय कंपनी में भी नौकरी जारी रखी लेकिन जून 2013 में वो पूरी तरह बिजनेस में कूद पड़े। आज टीपॉट के 21 आउटलेट हैं। इनमें ज्यादातर दिल्ली-एनसीआर में हैं। आज उनके आउटलेट पर आधा दर्जन चाय जैसे ब्‍लैक, ऊलॉन्‍ग, ग्रीन, व्‍हाइट, हर्बल और फ्लेवर्ड के 100 से अधिक स्‍वाद मिलते हैं।

टीपॉट का असम और दार्जीलिंग के पांच चाय बागानों से गठजोड़ है। हर साल कंपनी चाय के पांच नए फ्लेवर की शुरुआत करती है।

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