कंप्यूटर, मोबाइल से बिगड़ रही आंखों की रोशनी

प्रदूषण और बदलती आबोहवा के कारण मौजूदा वक्त में आंखों की बीमारियों बढ़ रही हैं। हवा में फैले प्रदूषण से जहां आंखों को नुकसान हो रहा है, वहीं लंबे समय तक कंप्यूटर या मोबाइल की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रहने से आंखों की नसों में तनाव के मामले भी बढ़ रहे हैं, जिससे आगे चलकर ग्लूकोमा नाम की बीमारी हो सकती है। यह जानकारी एम्स के डॉ राजेंद्र प्रसाद नेत्र चिकित्सालय के मुखिया डॉ अतुल कुमार सहित अन्य डॉक्टरों ने दी। वे सेंटर के स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित रहे सम्मेलन में बोल रहे थे। डॉक्टरों ने बताया कि आंखों में जलन, चुभन व लाली के इलाज के लिए कई बार डॉक्टर बिना सोचे-समझे स्टेरॉयड दे देते हैं, इसकी वजह से नेत्रहीनता के मामले बढ़ रहे हैं। लिहाजा स्टेरॉयड के पैकेट पर यह चेतावनी छापना अनिवार्य होना चाहिए कि इसका अधिक उपयोग आंखों के लिए घातक हो सकता है।

डॉ अतुल ने कहा कि जैसे ज्यादा तनावपूर्ण या मेहनत वाला काम करने या डंबल उठाने से हाथ-पैरों में कड़ापन आ जाता है, उसी तरह प्रदूषण और मोबाइल, टीवी व कंप्यूटर स्क्रीन पर देर तक आंखें गड़ाए रहने से आंखों में कड़ापन आ जाता है। इससे नसों में तनाव के मामले बढ़ रहे हैं जिससे नस फटने या अटैक पड़ने के मामले या असहनीय दर्द भी होने लगता है। ऐसे मरीज आजकल रोज आने लगे हैं, जो मोबाइल का अधिक उपयोग करने से परेशान हैं। ऐसे लोगों को चाहिए कि दो घंटे के अंतराल पर ही फोन देखें। थोड़ी देर पर आंखों को आराम दें, आसमान व हरियाली देखें और आंखों का व्यायाम करें। डॉ प्रद२२२ीप शर्मा ने बताया कि आजकल बच्चों में भी मायोपिया के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे बच्चों की आंखों के जल्द इलाज के लिए जरूरी है कि जन्म से हफ्ते भर के अंदर उनकी आंखों की जांच कराई जाए। जन्म के चार हफ्ते के भीतर मोतियाबिंद की जांच भी करा लेनी चाहिए। इसी तरह आंखों के तिरछेपन का भी बचपन में ही इलाज करा लेना चाहिए। इलाज में देरी करने पर तिरछापन तो ठीक किया जा सकता है, लेकिन आंख की क्षमता प्रभावित होती है।

डॉ अतुल कुमार ने काला मोतियाबिंद को साइलेंट किलर बताया। डॉ रमनजीत सिहोता ने बताया कि 40 साल की उम्र के बाद हर 20 में से एक व्यक्ति को इसका खतरा होता है। काला मोतियाबिंद होने पर लोगों को लगता है कि उनकी आंखों की रोशनी चली जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं है। समय पर पता चलने पर इसका इलाज मुमकिन है। उन्होंने बताया कि काला मोतियांिबंद के मरीज काफी देर से आते हैं जिससे जटिलता बढ़ जाती है। इस बीमारी में एक बार आंख की रोशनी जाने के बाद उसे वापस नहीं लाया जा सकता है।

डॉ महिपाल सचदेव ने बताया कि आंखों के कैंसर का इलाज भी मुमकिन है और कई मामले तो ऐसे होते हैं जिन्हें सिर्फ इंजेक्शन लगाकर ही सही किया जा सकता हैं। डॉ राधिका टंडन ने बताया कि आबोहवा बदलने पर किए गए अध्ययन में पूर्वोत्तर में नाखूना नामक बीमारी देखी गई। समुद्रतटीय इलाकों में अल्ट्रावायलेट किरणों से होने वाला नुकसान बढ़ रहा है और ग्रामीण इलाकों में आंखों का सूखापन बढ़ रहा है।

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