ये 5 अचूक उपाय बचा सकते हैं पितृ दोष से

क्या होता है पितृ दोष?

पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। इसकी अवधि सोलह दिन की होती है। इसका मूल उद्देश्य अपने पितरों यानी पूर्वजों का स्मरण करना और पारंपरिक रीति से तर्पण/पिण्ड करके उनका सम्मान करना है। पौराणिक मान्यता यह है कि पितृ पक्ष के दौरान स्वर्गवासी हो चुके हमारे पूर्वज स्वर्ग से नीचे धरती पर हमसे मिलने आते हैं। यदि हम प्रचलित रीति के अनुसार तर्पण/पिण्ड दान करते हैं तो वे बेहद खुश होते हैं और हमें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर अपने लोक लौट जाते हैं। किवदन्ती है कि जिन पूर्वजों का परंपरानुसार तर्पण/पिण्ड दान नहीं किया जाता है तो उनकीं आत्माएं अतृप्त रह जाती हैं। परिणास्वरूप वे रूष्ट हो जाते हैं और वे अभिशाप देकर चले जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, अनेक भयंकर रोग, समस्याएं, विषमताएं, अपयश, गरीबी, लाचारी मानसिक एवं शारीरिक कष्ट आदि का सामना करना पड़ता है। सरल एवं सहज अर्थों में पूर्वजों की अप्रसन्नता एवं अभिशाप ही पितृ दोष का मूल कारण बनता है। बेशक, इसे पौराणिक मान्यताओं और ज्योतिषविदों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है।

पितृ दोष के नाम पर सुनियोजित चक्रव्युह में कदापि न फसें

हमें पितृ दोष के नाम पर तरह-तरह से डराने व अनिष्ट की आशंकाओं से बुरी तरह भयभीत करके ठगने वाले अनेक प्रपंची व पाखण्डी लोग आम तौरपर मिल ही जाते हैं। हमें उनके चक्रव्यूह में फंसने से बचना चाहिए। यह तभी संभव हो पाएगा, जब हम अपने विवेक का इस्तेमाल करें और जागरूकता का परिचय दें। हमें भगवान बुद्ध की उक्ति का हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि ये दुनिया दुःखों का घर है। जाहिर है, जब हम इस दुनिया का एक हिस्सा हैं तो हमें अनेक प्रकार का दुःखों का सामना करना ही पड़ेगा। लेकिन, यदि हम संयम, समझदारी और सकारात्मकता का परिचय दें तो निश्चित तौरपर हमारी हर समस्या का सहज निवारण हो सकता है।

ये 5 अचूक उपाय बचा सकते हैं पितृ दोष से

1. अपने स्वर्गवासी बुजुर्गों/पितरों का शास्त्रों में वर्णित विधि-विधान के अनुसार तर्पण/पिण्ड दान करें और उनका सादर स्मरण करें। इसके साथ ही अपने जीवित बुजुर्गों, माता-पिता व गुरूजनों के प्रति हमेशा आदर एवं मान-सम्मान की अटूट भावना बनाए रखते हुए उनकी सेवा करें और उनका मार्गदर्शन व आशीर्वाद अनवरत रूप से लेते रहें। परिणामस्वरूप, सुख-समृद्धि एवं तरक्की के रास्ते निरन्तर खुलते रहेंगे।

2. अपने जीवन में कोई भी ऐसा काम न करें जिससे किसी की आत्मा को दुःख पहुंचे अथवा किसी का अहित हो। हमेशा परोपकार की राह पर चलें। आत्मिक शांति एवं संतुष्टि मिलेगी।

3. अपने पूर्वजों के नाम पर कोई भी प्रतीकात्मक पुण्यदायी कार्य जरूर करें, जैसे कि पौधारोपण, भूखे लोगों को भोजन, पेयजल व्यवस्था, बेहसहरा लोगों की मदद, गरीब बच्चों की पढ़ाई का प्रबन्ध, धर्मशाला/रैन बसेरा निर्माण, बेटियों को प्रोत्साहन, पक्षियों को दाना-पानी, निरीह प्राणियों के रक्षार्थ व्यवस्था निर्माण, वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में दान आदि जो भी कार्य सहज और संभव हो, वह जरूर करना चाहिए। इससे निश्चित तौरपर हमारे पूर्वज हमपर गर्व करेंगे और हमारे कार्यों से प्रसन्न होंगे।

4. यदि हम किसी आपराधिक एवं असामाजिक कृत्य, अनैतिक आचरण और नशे आदि बुरी लत से दूर रहेंगे तो हमें सम्मान की प्राप्ति होगी और हमारे पूर्वजों को प्रसन्नता होगी।

5. यदि हम अपनी सभी जिम्मेदारियों का पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ पालन करेंगे और सत्य, संयम, सजगता, सौहार्द भावना और आपसी सामंजस्य जैसे गुणों का समावेश अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व में करेंगे तो निश्चित तौरपर हमारे पितरों को हम पर गर्व की अनुभूति होगी और हमें अच्छा आशीर्वाद देंगे।

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