डॉ कफील खान की मिली जमानत ……

डॉ कफील जमानत के बाद की जिंदगी और मुश्किल है. डॉ कफील को फिलहाल प्रैक्टिस की इजाजत नहीं. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में पिछले साल ऑक्सीजन की कमी से लगभग 70 बच्चों की मौत हो गई और उसके बाद ही डॉ कफील खान को सितंबर 2017 से अप्रैल 2018 तक के दिन कारावास में बिताने पड़े हाल ही में रिहा हुए कफील ने इन 8 महीनो को एक जेल-डायरी में समेट कर अपना दर्द साँझा करने की कोशिश की है.  डायरी की शुरुआत के लिखा है- मैं बैरक के एक कोने में बैठा रहता.

वहीं सोचता, वहीं सो जाता. कभी खाना खाता, कभी नहीं. कई-कई दिन बीतते, नहाने की हिम्मत नहीं जुटती क्योंकि सबको साथ नहाना होता था. शाम के 6 बजते ही हम अंदर कर दिए जाते तो सुबह 6 बजे ताला खुलता. गिनती होती. कैदियों की कतार में अपनी बारी का इंतजार करते हुए अस्पताल में मरीजों का इंतज़ार याद आता. और वो रात जब मरते बच्चों की सांसों के लिए मैं रातभर यहां से वहां दौड़ता और ऊपरवाले से दुआ मांगता रहा.

जेल के भीतर रोजमर्रा के कामों को लेकर भी पेशोपेश में रहता. ख़ून, बलात्कार, राजद्रोह के आरोपियों के बीच उस इंतज़ार के खत्म होने के इंतज़ार में जिसकी कोई मियाद नहीं थी. 2 सितंबर की रात तकरीबन डेढ़ बजे भाई का फोन आया, तब मैं गोरखपुर से छिपते-छिपाते दिल्ली आ चुका था. उसने कहा कि मैं खुद को पुलिस के हवाले न करूं तो लखनऊ में मेरी बहन गिरफ्तार कर ली जाएगी. ये कोरी धमकी नहीं थी. आवाज में थरथराहट मैं फोन पर भी महसूस कर रहा था. अगली सुबह मैं लखनऊ में था. वहां से मुझे एक खुफिया जगह ले जाया गया. सवाल किए गए, धमकियां दी गईं कि मुझे या मेरे परिवार को किसी भी हाल में मीडिया के सामने कोई बयान नहीं देना है. मेडिकल चेकअप के बाद रातोंरात गोरखपुर जेल में डाल दिया गया. चमचमाती दूधिया रौशनी वाले घर से एकाएक अंधेरी, सीलनभरी एक बैरक में.

जेल के मेरे इन दिनों ने अपने-परायों की पहचान दी. मेडिकल कॉलेज में साथ पढ़ने वाले, अक्सर शाम को घर आने वाले, फोन पर घंटों बतियाने वाले किसी दोस्त या रिश्तेदार का चेहरा मुझे नहीं दिखा. सबको डर था कि मुझसे मिलेंगे तो वे भी जेल न पहुंच जाएं. मेरे ड्राइवर को भी पकड़कर भीतर कर दिया गया था. करीबी रिश्तेदारों पर नजर रखी जा रही थी. उनका डर वाजिब था, मैंने बिना मांगे ही सबको माफी दे दी. ऊपरवाले से रोज दुआ मांगता कि वही देना जिसका मैं हकदार हूं.

25 अप्रैल की शाम 5 बजे जेलर साहब का बुलावा आता है. मुझे जमानत मिल चुकी थी. वे खबर सुना रहे थे और मैं बस उनका चेहरा देखता रहा. जिंदगी में कितने ही खुशी के मौके आए लेकिन आजादी से बड़ी कोई खुशी नहीं. शुक्रिया अदा कर अपनी बैरक पहुंचा तो साथियों ने गले लगा लिया. किसी परिवार की ही तरह वे खुश थे.

28 अप्रैल. साथियों को विदा कह, उन्हें एक सुंदर दुनिया में दोबारा मिलने का भरोसा दे मैं बाहर आया. घरवालों के अलावा किसी के आने की उम्मीद नहीं थी. लेकिन जेल के बाहर हजारों लोग खड़े थे. इनमें वे मां-बाप भी थे, जिनके बच्चों को मैं बचा नहीं सका था. आठ महीनों तक सख्ती से जबड़े भींचा कफील अब रो रहा था. उस रोज पता नहीं कितने अनजान हाथों को मैंने आंखों से लगाया.अगली सुबह एक आवाज से साथ नींद खुली. मेरी 17 महीने की बेटी अपने कमरे और अपने बिस्तर पर एक नया चेहरा देखकर चीख रही थी. छोड़कर गया था तो वो गोद में थी, अब बोलने लगी थी. मेरे भाई को अब्बू कहती. वक्त के साथ अब मुझे पहचानने लगी है लेकिन मैंने उसके 8 महीने ‘मिस’ कर दिए. एक पीडियाट्रिशियन होने के नाते पेरेंट्स को बच्चों के माइलस्टोन बताया करता, और खुद अपनी बेटी को पहली बार चलता-बोलता नहीं देख सका.

 

 

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