अपरा एकादशी के दिन न करें इन चीजों का सेवन….

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। अपरा एकादशी को जलक्रीड़ा एकादशी, भद्रकाली तथा अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु और उनके 5वें अवतार वामन ऋषि की पूजा की जाती है।

अपरा/अचला एकादशी की प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया।

इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा। एक दिन अचानक धौम्य नामक ऋषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा।

ऋषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया। दयालु ऋषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई।

वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया। अत: अपरा एकादशी की कथा पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। अपरा एकादशी व्रत से मनुष्य को अपार खुशियों की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।

विशेष पूजन विधि

भगवान नारायण का विधिवत पूजन करें। केसर मिले घी से दीप करें, गुलाब की अगरबत्ती करें, कुंकुम चढ़ाएं, लाल फूल चढ़ाएं, सेब की खीर का भोग लगाएं। एक दिन पूर्व तोड़े तुलसी पत्र पर शहद लगाकर समर्पित करें तथा इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें। पूजन के बाद सेब की खीर किसी सुहागन को दान दें।

इस व्रत में वैसे तो दशमी तिथि को मिट्टी, पीतल, तांबे अथवा किसी भी धातु के कलश की स्थापना की जाती है परंतु यदि किसी कारणवश ऐसा सम्भव न हो तो व्रत करने के लिए स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर भी पहले जल से भरे कलश की स्थापना की जा सकती है। कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज (सतनाजा) रखकर कलश के ऊपर जौं रखें तथा धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प एवं फलों सहित भगवान विष्णु जी का पूजन करें। सारा दिन उपवास रखकर फलाहार करें।

अगले दिन यानि 12 मई को उस कलश पर दक्षिणा रखकर किसी ब्राह्मण को वह कलश भेंट कर देना चाहिए। जिस कामना से कोई यह व्रत करता है उसे उस कार्य में पूर्ण रुप में सफलता अवश्य प्राप्त होती है। व्रत में रात्रि जागरण करते हुए अपना समय प्रभु नाम संकीर्तन में बिताने से प्रभु अत्यधिक प्रसन्न होते हैं

एकादशी के दिन एक भूल भी शुभ फल से वंचित कर सकती है। इस दिन कुछ ऐसी चीजें हैं जिनका सेवन करना नुक्सानदेय माना जाता है। एकादशी में भूलकर भी इन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। माना जाता है कि एकादशी के दिन चावल खाना अखाद्य पदार्थ अर्थात नहीं खाने योग्य पदार्थ खाने का फल प्रदान करता है। एक कथा के अनुसार माता के क्रोध से रक्षा के लिए महर्षि मेधा ने देह त्याग दी थी। उनके शरीर का अंश भूमि में समा गया। कालांतर में वही अंश जौ एवं चावल के रूप में भूमि से उत्पन्न हुआ। जब महर्षि की देह भूमि में समाई, उस दिन एकादशी तिथि थी। अत: प्राचीन काल से ही यह परंपरा शुरू हो गई कि एकादशी के दिन चावल एवं जौ से बने भोज्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसलिए एकादशी के दिन इन पदार्थों का सेवन महर्षि की देह के सेवन के समान माना गया है।

विज्ञान के अनुसार चावल में जल तत्व की मात्रा अधिक होती है। ज्योतिष शास्‍त्र की मानें तो जल तत्व की अधिकता मन को विचलित कर सकती है, क्योंकि जल और चंद्रमा में परस्पर आकर्षण होता है। चंद्रमा के कारण समुद्र में ज्वार आता है। इस प्रकार चावल का अधिक सेवन करने पर यदि शरीर में जल तत्व की मात्रा अधिक होगी तो मन अशांत महसूस करता है। अशांत मन से व्रत का पालन नहीं किया जाएगा। चूंकि एकादशी व्रत, संयम और साधना का दिन है। इसलिए मन को विचलित करने वाले पदार्थों से दूर रहने की हिदायत दी जाती है।

  • एकादशी के दिन लहसुन, प्याज का सेवन करना भी वर्जित है। इसे गंध युक्त और मन में काम भाव बढ़ाने की क्षमता के कारण अशुद्ध माना गया है।
  • इसी प्रकार एकादशी और द्वादशी त‌िथ‌ि के द‌िन बैंगन खाना अशुभ होता है।
  • एकादशी के दिन मांस अौर मदिरा का सेवन करने वाले को नरक की यातनाएं झेलनी पड़ती है।
  • इस दिन सेम का सेवन भी नहीं करना चाहिए। एकादशी के दिन इसका सेवन संतान के लिए हानिकारक हो सकता है।

 

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