ये 5 चीजे हो तो बुरे से बुरे कर्म करने वालों को भी यमदूत नहीं ले जाते नर्क

मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य और इससे कोई बच भी नहीं सकता। लेकिन सवाल फिर भी है उठता है कि आखिर मृत्यु के बाद क्या।

शास्त्रों और पुराणों में जो बातें बतायी गई हैं उनके अनुसार मृत्यु के बाद जीव की मुख्य रूप से दो गति होती है चाहे तो वह अपने सद्कर्मों से स्वर्ग जाता है या बुरे कर्मों का फल भोगने नर्क। स्वर्ग और नर्क की अवधारणा में नर्क को बड़ा ही दुखदायी और कष्टकारी माना गया है और शरीर में विराजमान आत्मा नर्क के नाम से ही कांपती है जबकि स्वर्ग और मोक्ष की कल्पना मात्र से आत्मा प्रसन्न हो जाती हैं। इसलिए आत्मा को नर्क जाने से बचाने के लिए पुराणों में कई उपाय बताए गए हैं जिनमें ये 5 आसान उपाय हर कोई आजमा सकता है।

पुराणों में बताया गया है कि मृत्यु के समय जिस व्यक्ति के पास इन पांच चीजों में से एक भी चीज रहती है उन्हें यमदूत नर्क नहीं ले जाते हैं। इतना ही नहीं इनसे मृत्यु के समय शरीर से जब प्राण निकलता है उस दौरान होने वाले कष्टों से भी मुक्ति मिल जाती है।

 

तुलसी का पौधा या तुलसी का पत्ता मृत्यु के समय सिर के पास होने पर यमदूत का भय नहीं रहता। इसकी वजह यह है कि पुराणों में तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिया के रूप में बताया गया है और यह भगवान विष्णु के सिर पर शोभा पाती है। इनके पास होने से मुक्ति की राह आसान हो जाती है।

मृत्यु के समय गंगाजल मुंह में हो और गंगा जल सिरहाने रहे तो नर्क जाकर यमदंड को नहीं भोगना पड़ता है क्योंकि इस समय मुख में गंगाजल होने से व्यक्ति का शरीर और मन शुद्ध एवं पवित्र हो जाता है। पुराणों में बताया गया है कि शुद्ध और पवित्र मन में प्राण जब शरीर को त्यागता है तो कष्ट नहीं भोगना पड़ता है और न तो यमराज उसे कठोर दंड देते हैं।

श्रीमद्भाग्वत गीता का पाठ मृत्यु के समय सुनाने से आत्मा का शरीर से मोह दूर होता है और बिना कष्ट के आत्मा शरीर का त्याग कर देती है और मुक्ति की ओर बढ़ जाती है।

रामायण का पाठ सुनना भी मृत्यु सैय्या पर लेटे व्यक्ति के लिए लाभप्रद हो जाता है। रामायण भगवान विष्णु के रामावतार की लीला कथा है जो व्यक्ति के मन को आनंदित कर देती है और मृत्यु के समय होने वाले कष्ट के एहसास को खत्म कर देती है। श्रीमद्भाग्वत, गीता सहित दूसरे पुराणों में भी उल्लेख आया है कि मृत्यु के समय मनुष्य जिस विषय को सोचता है मृत्यु के बाद उसकी वैसी ही गति होती है। रामायाण, गीता या कुराण जो व्यक्ति का धर्म ग्रंथ हो उसे सुनते हुए प्राण त्यागने पर नर्क का कष्ट नहीं भोगना पड़ता है क्योंकि व्यक्ति का मन अपने ईश्वर की ओर लगा रहता है।

 

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