हर दिन 600 किलो चीनी से बनती है स्वर्ण मंदिर की चाय, हर घंटे 30,000 श्रद्धालु लेते हैं चुस्की

अगर आपने कभी डिनर पार्टी की होगी, तो मेहमानों के लिए खाने बनाने का चैलेज अच्छे से मालूम होगा। एक दिन में पांच लाख लोगों को खाना… कुछ ऐसा ही चैलेंज लेते हैं स्वर्ण मंदिर के स्वयंसेवक शेफ और चाय वाले।
स्वर्ण मंदिर में हर दिन तीर्थयात्रियों से लेकर पर्यटकों के लिए लंगर और चाय की व्यवस्था होती है। औसतन सप्ताह के दिन, तकरीबन 80,000 लोग लंगर खाने आते हैं। लेकिन गुरू नानक जंयती में तकरीबन आधा मिलियन लंगर खाते हैं।
हर 15 मिनट में एक नया ग्रुप भोजनायल परिसर में लंगर खाने पहुंचता है। उनकी सीटों पर दाल, सब्जी और रोटी से भरी हुई थाली पहुंचती है। औसतन इस रसोई घर में खाना बनाने के लिए हर रोज 5 हजार किलोग्राम लकड़ी और सौ से ज्यादा एलपीजी गैस सिलेडंर का इस्तेमाल होता है।
यहां तैयार होने वाले खाने को कई सौ स्वंय सेवक खाना खाने के लिए आने वाले लोगों के लिए परोसते हैं। इसके अलावा झूठे बर्तन धोने और रसोई घर में काम करने के लिए 4सौ से ज्यादा कर्मचारी रात दिन काम करते हैं। जो लोग खुद अपनी ओर से इस रसोई घर में हाथ बंटाना चाहते हैं उनको भी इस काम में लगाया जाता है।
20 साल के सुखप्रीत सिंह, स्वर्ण मंदिर में रोजाना भक्तों की सेवा करते हैं। वो रोजाना डिनर में पानी देना का काम करते हैं।  18 साल के बाद से ही वो रोजाना शाम 7 बजे से रात 2 बजे तक अपना काम बखूबी रूप से करते हैं। वो अब सबसे बड़े स्वर्ण मंदिर में चाय वाले के नाम से जाने जाते हैं।
सुखप्रीत बताते हैं, उन्हे नहीं पता कि स्वर्ण मंदिर कब से चाय दे रहे हैं। लेकिन इतना जानते हैं कि ब्रिटिशर्स चाय भारत लाए थे। उससे पहले हम सिर्फ दूध का सेवन करते थे।
लंगर के मैनेजर, हरप्रीत सिंह का मानना है कि प्रति घंटे कम से कम 30,000 चाय पिलाई जाती है। सुखप्रीत एक रात पहले चाय तैयार करते थे। इसे तैयार करना एक इंसान की बात नहीं, इसलिए सुखप्रीत 6 और दोस्तों को काम में ले आए।  प्रत्येक कड़ाही के लिए, वे 300 लीटर पानी में 30 किलोग्राम सूखे दूध पाउडर डालते है। इस बनने में करीबी 30 मिनट का समय लगता है।
जब दूध तैयार हो जाता है तो सुखप्रीत के दो दोस्त 50 किलो चीनी लगाकर चाय का स्वाद बराबर करते हैं।
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