आज भी इस मंदिर में द्रौपदी खुद आकर करती है पूजा, हस्तिनापुर में मौजूद है सबूत

देश की राजधानी दिल्ली से 110 किमी और क्रांतिधरा मेरठ से करीब 38 किमी की दूरी पर गंगा किनारे बसा महाभारतकालीन हस्तिनापुर (जंबूद्वीप) (Pandaveshwar Temple) प्रसिद्ध धर्म स्थलों में से एक है। खास बात यह है कि यहां देश ही नहीं विदेशों से पर्यटक घूमने आते हैं।

इससे भी खास बात यह है कि हस्तिनापुर सुंदरतम स्थलों में शुमार है। बताया जाता है कि द्रौपदी यहीं के एक मंदिर में पूजा-अर्चना करती थी। यहां कलकल बहती पतित पावन गंगा और अन्य छोटी-छोटी नदियां, जड़ी बूटी और दुर्लभ प्रजाति के जीव जंतु की अभ्यारण्य में बहुतायत में है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और भौगोलिक स्थिति इतनी आकर्षक है कि देश के कोने-कोने से श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। विश्व के कई देशों से पक्षी यहां आकर शरद ऋतु में प्रवास करते हैं।

बता दें कि यहां आरक्षित वन जंगल एवं झीले होने से प्राकृतिक सौंदर्य अनुपम है। हस्तिनापुर जैन, हिंदू एवं सिख धर्म की पवित्र स्थली है। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु इस धार्मिक स्थल के दर्शन करने आते हैं।

हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश में मेरठ के निकट स्थित महाराज हस्ती का बसाया हुआ एक प्राचीन नगर, जो कौरवों और पांडवों की राजधानी थी। इसका महाभारत में वर्णित अनेक घटनाओं से संबंध है। महाभारत से जुड़ी सारी घटनाएं हस्तिनापुर में ही हुई थीं। अभी भी यहां महाभारत काल से जुड़े कुछ अवशेष मौजूद हैं। इनमें कौरवों-पांडवों के महलों और मंदिरों के अवशेष प्रमुख हैं।

इसके अलावा हस्तिनापुर को चक्रवर्ती सम्राट भरत की भी राजधानी माना जाता है। यहां स्थित ‘पांडेश्वर महादेव मंदिर’ की काफी मान्यता है। कहा जाता है यह वही मंदिर है, जहां पांडवों की रानी द्रौपदी पूजा के लिए जाया करती थी। पौराणिक काल में हस्तिनापुर के राजा का नाम अधिसीम कृष्ण था।

द्रौपदी करती थी पूजा

मंदिर के निकट पांडव टीले पर भगवान शिव की विशाल मूर्ति स्थित है। यहां पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर में लगी पांच पांडवों की मूर्ति महाभारतकालीन है। इसका अंदाजा उनकी कलाकृति से लगता है। यहां स्थित शिवलिंग प्राकृतिक है। यह शिवलिंग जलाभिषेक के चलते आधा रह गया है।

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वहीं पांडवेश्वर मंदिर के आसपास आरक्षित जंगल की हरियाली और ऊंची पहाड़ियों की श्रृंखला प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम स्थल है। यहां प्रतिदिन श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। किवदंती है कि महाभारतकाल में पांडु पुत्र युधिष्ठिर ने धर्मयुद्ध से पूर्व यहां शिवलिंग की स्थापना कर बाबा भोलेनाथ से युद्ध में विजयी होने की मन्नत मांगी थी। यही नहीं मंदिर के समीप गंगा की धारा बहती थी। द्रौपदी प्रतिदिन इस मंदिर में पूजा-अर्चना करती थीं। मंदिर परिसर के बीच में शिवलिंग स्थित है।

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मंदिर परिसर स्थित प्राचीन विशाल वट वृक्ष है। इस वृक्ष के नीचे भी श्रद्धालु दीपक जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। यहीं पर प्राचीन शीतल जल का कुआं स्थित है। इसका जल श्रद्धालु अपने साथ ले जाते हैं। इस जल के घर में छिड़कने से शांति मिलती है। महाभारतकालीन इस मंदिर का जीर्णोद्धार बहसूमा किला परीक्षितगढ़ के राजा नैन सिंह ने 1798 में कराया था।

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