बड़ी खबर : सुप्रीम कोर्ट ने सेरिडॉन समेत दो अन्य दवाओं से हटाया बैन, दी बेचने की परमिशन

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सेरिडॉन, प्रिट्रान और डार्ट ड्रग्स पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है। कोर्ट ने यह फैसला दवा निर्माताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। जस्टिस आर.एफ. नरीमन और इंदू मल्होत्रा की पीठ ने इस मामले में दवा निर्माताओं और फार्मा एसोसिएशंस की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जिन दवाओं से रोक हटाई गई हैं उनमें पिरामल हेल्थकेयर की सैरीडॉन, ग्लाक्सो स्मिथक्लिन की प्रिट्रान और जगत फार्मा की डार्ट ड्रग्स के अलावा कुछ और कंपनियों के उत्पाद हैं।

हालांकि कोर्ट ने केंद्र द्वारा रोक लगाई गई 328 एफडीसी दवाओं में से बाकी को कोई राहत देने से इनकार कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले भारतीय फार्मा कंपनी वॉकहार्ड्ट को एस प्रोक्सीवोन टेबलेट बेचने की अनुमति दे दी थी जो तीन सॉल्ट से मिलकर बना है और इस पर रोक लगी हुई थी। फार्मा कंपनियों की दलील थी कि वे इन दवाओं को पिछले 11 सालों से बेच रहे हैं और इसका कोई नुकसान सामने नहीं आया है।

केंद्र सरकार ने मार्च 2016 में औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26-ए के तहत मानव उपयोग के उद्देश्य से 344 एफडीसी के उत्पादन, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद सरकार ने समान प्रावधानों के तहत 344 एफडीसी के अलावा पांच और एफडीसी दवाओं को प्रतिबंधित कर दिया था। हालांकि, इससे प्रभावित उत्पादकों अथवा निर्माताओं ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 15 दिसम्बर, 2017 को सुनाए गए फैसले में दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए इस मसले पर ड्रग्स टेकनीकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) द्वारा गौर किया गया, जिसका गठन औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 5 के तहत हुआ था। इसके अलावा मंत्रालय ने कुछ शर्तो के साथ छह एफडीसी के उत्पादन, बिक्री अथवा वितरण को भी प्रतिबंधित कर दिया था।

क्या है एफडीसी दवाएं

एफडीसी वह दवाएं हैं जो दो या दो से अधिक दवाओं के अवयवों (सॉल्ट) को मिलाकर बनाई जाती हैं। दुनिया के अधिकांश देशों में इन दवाओं के उपयोग पर रोक लगाई गई है। देश में सक्रिय कई स्वास्थ्य संगठन लंबे समय से कहते आ रहे थे कि इन दवाओं से मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ होता है और ये हानिकारक भी हो सकती हैं। संगठनों का कहना था कि अगर किसी दवा की वजह से मरीज को एलर्जी हो गई तो यह पता लगाना भी मुश्किल हो जाएगा कि उस दवा के किस सॉल्ट की वजह से एलर्जी हुई है। ऐसे में एलर्जी का इलाज करने में देर भी हो सकती हैं। स्वास्थ्य कर्मियों के साथ ही संसद की एक समिति ने भी इन पर सवाल उठाए थे। समिति का कहना है कि ये दवाइयां बिना मंजूरी और अवैज्ञानिक तरीके से बनाई जाती हैं।

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