रोजाना शंख बजाने से बढ़ती है स्मरण शक्ति….

रामायण, महाभारत तथा अनेक प्रसंगों में बड़े सम्मान के साथ चर्चित, विश्व के सभी जल जंतुओं में शंख एक मात्र ऐसा जीव है जो रूपाकार में कुरूप होने के बावजूद धार्मिक अनुष्ठानों में सर्वाधिक पूज्यनीय और मान्य है। शंख विजय, समृद्धि, शुभ और यश का प्रतीक माना गया है।

सामाजिक जीवन का लगभग हर अवसर इसकी गूंज से पवित्र और मंगलमय होता रहा है। उत्सव, पर्व, पूजा, हवन, जयकार, मंगलध्वनि, प्रयाण, आगमन, युद्ध आरंभ, विजयवरण, विवाह, विदा, राज्याभिषेक, देवार्चन आदि सैंकड़ों ऐसे अवसर हैं जिन्हें शंख ध्वनि के बिना पूर्णता नहीं मिलती। यह ध्वनि शास्त्र सम्मत शुभ और अनिवार्य है।

पौराणिक प्रसंगों में उल्लेख मिलता है कि अनेक देवता और देवियां आयुध के रूप में शंख धारण किया करते थे। शंख वादन से उनकी प्रसन्नता व्यक्त होती थी। श्रीमद्भागवत में, महाभारत के अंतर्गत ‘गीता’ वाले प्रसंग में कौरव-पांडव सेनानियों के बीच शंखों के प्रयोग का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार भगवान विष्णु की स्तुति में भी उन्हें सशंख होना बताया गया है। देवी स्वरूपों की तो कल्पना भी शंख के बिना नहीं की जाती।

‘शंख सन्दधतीं करै स्त्रिनयनां सर्वांगं भूषावृत्ताम।’

शंखनाद का सम्मान वाद्य यंत्रों के सम्मान जैसा ही है। प्राचीन काल से शंखनाद का उपयोग पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ, आरती जैसे अवसरों पर वायुमंडल को भौतिक वायव्य और दैविक प्रकोपों-बाधाओं से मुक्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। वहीं शंखध्वनि के मनोवैज्ञानिक प्रभाव से ओज, तेज, साहस, पराक्रम, चैतन्य, आशा और स्फूॢत का संचार भी होता है।

आकार, रंग और भार की दृष्टि से शंख विभिन्न जाति और नाम के होते हैं। समुद्र के अलावा शंख किसी-किसी नदियों में छोटे-बड़े आकारों में मिलते हैं। शंख गेहूं के दाने के बराबर भी मिलता है और इसके बड़े आकार की कोई सीमा नहीं है।

विभिन्न प्रकार के शंखों के स्वर भी अलग-अलग होते हैं। आकार-प्रकार से ही शंखों की गुणवत्ता तय होती है। जो शंख देखने में चमकीला, सुडौल, सुंदर, अभंग, स्पष्ट और मधुर ध्वनि करने वाला होता है, वही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। देव स्थानों में शंख को देव प्रतिमाओं के समान ही श्रद्धा और सम्मान दिया जाता है। शंख को लक्ष्मी का सहोदर और विष्णु का प्रिय माना गया है। यह विश्वास है कि जहां शंख होता है, वहां लक्ष्मी निवास करती हैं। विष्णु जी के पूछने पर लक्ष्मी जी ने कहा था-

‘वसामि पद्मोत्पल शंखमध्ये, वासामि चन्द्रे च महेश्वरे च’

(अर्थात, हे प्रभो, मैं पद्म, उत्पल, शंख, चंद्रमा और शिवजी में निवास करती हूं।)
कुछ भ्रांतियों के कारण एक ऐसा वर्ग भी है जो शंख को दरिद्रता का सूचक मानता है। यह विचार शंख निषेधों को ठीक प्रकार न जानने के कारण ही जनमानस में फैल गया है।

शंख का उपयोग पेपर वेट अथवा शो पीस के रूप में नहीं करना चाहिए। अन्यथा शंख का वास्तविक गुण क्षीण हो जाता है। किसी कारण से टूटा-फूटा, चोटिल, घिसा-पिटा, दरारयुक्त, चटका हुआ, कुरूप, बेसुरी आवाज वाला शंख प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। ऐसे शंखों को पुन: नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। घर में दो शंख नहीं रखने चाहिएं। देव स्थानों में इनकी संख्या अधिक हो सकती है। तंत्र शास्त्र में वामावर्ती शंख के स्थान पर दक्षिणवर्ती शंख को ज्यादा महत्व दिया गया है। शोभा की दृष्टि से भी सुंदर और उत्तम माना जाता है, जबकि सीमावर्ती शंख की बनावट मोहक लेकिन जटिल होती है। कवच मजबूत और भारयुक्त होता है। यह धनदायक होता है।

दक्षिणवर्ती शंख मुश्किल से उपलब्ध होता है। तांत्रिक सिद्धियों के लिए देवत्व गुणों वाले इसी शंख की आवश्यकता पड़ती है। गृहस्थ आश्रमों में रखे जाने वाले शंख भी निर्दोष होने चाहिएं। शंख शिखर सुरक्षित होने पर ही शंख का प्रभाव होता है। भग्न शिखर अथवा भग्न मुख वाला शंख न तो खरीदना चाहिए, न घर में रखना चाहिए। दक्षिणवर्ती शंख तोड़े या बजाय नहीं जाते लेकिन यदि वह श्वेतवर्णी और बजाने योग्य भी हो तो इसे पूजा में रखना शुभ माना जाता है। इसकी प्रतिमाओं के समान ही पूजा करनी चाहिए। गंगाजल अथवा शुद्धजल से शंख को पवित्र और स्वच्छ करके ही इसका वादन करना चाहिए जिस परिवार के लोग शंख वादन करते हैं, वहां श्वास संबंधी रोग नहीं होते। देवताओं का वास होता है।

पूजा के योग सर्वगुणों वाला शंख सहज सुलभ नहीं होता। इसलिए ऐसे शंख की प्राप्ति के लिए मुहूर्त का प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है। इसलिए कोई अच्छा शंख किसी भी मुहूर्त में मिले, जातक को प्राप्त कर लेना चाहिए। इसके लिए कोई शुभ दिन चुना जाए तो अच्छा रहता है। रविपुष्प योग अथवा गुरु पुष्पयोग सर्वोत्तम रहता है।

शंख लाने के बाद उसे किसी थाली अथवा चांदी के बर्तन में रखकर अच्छी तरह स्नान करवाना चाहिए। गंगाजल मिले तो इसके लिए सर्वोत्तम होगा, और न मिले तो गाय का कच्चा दूध भी ठीक रहेगा। नए वस्त्र से स्नान करवाए गए शंख को पोंछकर सफेद चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप से उसकी विधि-विधान के साथ पूजन करें और भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी से आग्रह करें कि वे शंख में निवास करें।

प्रतिदिन पूजा के समय शंख पूजा का यही विधि-विधान अपनाएं। शंख पूजन के समय जाप के लिए निम्नलिखित मंत्रों में से कोई एक मंत्र चुना जा सकता है-

श्री लक्ष्मी सहोदराय नम:।
श्री पयोनिधि जाताय नम:।
श्री दक्षिणवत्र्त शंखाय नम:

ह्वीं श्री क्लीं श्रीधर करस्थाय, पयोनिधिजाताय, लक्ष्मी सहोदराय, दक्षिणावत्र्त शंखाय नम:।
ह्वीं श्री धर करस्थाय, लक्ष्मीप्रियाय, दक्षिणवत्र्त शंखाय मम चिङ्क्षततं फलं प्राप्तयथार्य नम:।

शंख की प्राण प्रतिष्ठा के लिए उपरोक्त सभी मंत्र स्वयं सिद्ध हैं। ‘श्री लक्ष्मी सहोदराय नम:’ सबसे सरल और प्रथम, प्रभावी मंत्र है। साधक अपनी सामथ्र्य के अनुसार कोई भी मंत्र जप कर शंख के अद्भुत प्रभावों का लाभ उठा सकता है। शंख का पूजन विधि-विधानपूर्वक साधक यदि श्रद्धा भक्ति के साथ करें तो इसका प्रभाव रत्नों के समान ही होता है।

दक्षिणवर्ती शंख जिस परिवार में स्थापित रहता है, वहां दरिद्रता नहीं रहती, शांति और समृद्धि का निवास होता है।

शंख में शुद्ध जल भर कर व्यक्ति, वस्तु, स्थान पर छिड़कने से दुर्भाग्य, अभिशाप, अभिचार और दुर्ग्रह के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। जादू, टोना, नजर जैसे प्रभावों का इससे नाश होता है।

वैज्ञानिक आधारों पर यह सिद्ध हो चुका है कि प्रतिदिन पांच से दस मिनट तक शंख वादन करने वालों की श्वास गति अति स्वाभाविक होती है। ऐसे साधक दीर्घजीवी होते हैं। शंख वादन स्त्रियों और पुरुषों दोनों को करना चाहिए। शंख की ध्वनि सुनकर देवी-देवता के भी सतर्क हो जाते हैं। इस ध्वनि की पवित्रता जीवों को जागृत करती है। इससे वनस्पतियां प्रसन्न होती हैं।

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