घर की छत पर कहीं भी उगा लें ये चीज…..

जी हाँ, इस सब्ज़ी की अपनी एक अलग ही खासियत है। तो चलिए जानते हैं इस सब्जी और इसकी खासियत के बारे में। छतरी, टटमोर, डुंघरू या गुच्छी ये नाम है इस अजूबी सब्ज़ी के।

यह सब्ज़ी औषधिय गुणों से भरपूर होती है। यह औषधीय गुणों से भरपूर सब्ज़ी शिमला के जंगलों में पायी जाती है। प्रकृति के खजाने के इस कीमती तोहफे को पाने के लिए यहाँ के लोगों में हर बार कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है।

गुच्छी की कीमत 25 से 30 हजार रु. किलो तक होती है। आप इसे घर की छत पर भी उगा सकते हैं। घर की छत पर 15 से 20 किलो गुच्छी उगाकर आप 3 महीनों में 7.50 लाख तक कमा सकते हैं। इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए गुच्छी एक वरदान की तरह है ,क्योंकि इससे यहां रहने वाले लोगों की अच्छी खासी कमाई होती है ।स्थानीय लोगों के अनुसार गुच्छी पहाड़ों पर बिजली की गड़गड़ाहट व चमक के कारण बर्फ से निकलती है। इस सब्जी का इस्तेमाल लोग सर्दियों में करते हैं। यहाँ के लोगों ने बताया कि 1980 के सिंहस्थ में जूना अखाड़ा के एक महंत ने 45 लाख रुपए की गुच्छी की सब्जी का भंडारा सात दिन तक चलाया था।

गुच्छी का वैज्ञानिक नाम मार्कुला एस्क्यूपलेंटा है, और इसे हिंदी में स्पंज मशरूम कहा जाता है।यह सब्जी हिमाचल और कश्मीर की पहाड़ियों में पाई जाती है। इस सब्जी की उत्पति प्रति वर्ष मार्च और अप्रैल महीने के बीच में होती है।इसके साथ ही कई बड़े-बड़े होटल और कंपनियां इस सब्जी को हाथों – हाथ खरीद लेती हैं। क्योंकि इस सब्जी की मांग भारत सहित इटली, फ्रांस, अमेरिका जैसे देशों में बहुत ज्यादा है।जंगलों में निकलने वाली एक अलग प्रकार की मशरूम प्रजाति को गुच्छी कहा जाता है।

यह सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर है और इसे नियमित खाने से दिल की बिमारियां दूर होती है तथा यह सब्जी हार्ट पेशेंट के लिए भी बहुत उपयोगी होती है।इस सब्ज़ी में विटामिन-बी और डी के अलावा विटामिन-सी और विटामिन-के प्रचुर मात्रा में होता है। इन इलाकों में रहने वाले लोग इसके सीजन के समय जंगलों में ही डेरा डालकर गुच्छी इकट्ठा करते हैं। इन लोगों से गुच्छी बड़ी कंपनियां 10 से 15 हजार रुपए प्रतिकिलो के हिसाब खरीद लेती हैं, जबकि बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति किलो तक है।

यह सब्जी दिल के मरीजों के लिए काफी फायदे मंद मानी जाती है। इसीलिए इस सब्जी की आज बाजार में बहुत ही ज्यादा माँग है।लेकिन इसकी उत्पति बहुत ही कम हो पाती है, क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से उगती है और बहुत ही कम छेत्रो में ही पायी जाती है।

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