सूर्य को भगवान हिन्दू धर्म में क्यों माना जाता है…..

किसी ने भी भगवान को नहीं देखा है, लेकिन सूर्य और चंद्रमा को हर व्यक्ति ने देखा है. ज्योतिष में सूर्य और चंद्रमा दोनों ही ग्रह माने गए हैं, जबकि विज्ञान कहता है कि चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है. ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों में सूर्य को राजा और चंद्रमा को रानी व मन का कारक माना गया गया है.

सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा जी के मुख से ‘ऊँ’ प्रकट हुआ था, वही सूर्य का प्रारम्भिक सूक्ष्म स्वरूप था. इसके बाद भूः भुव तथा स्व शब्द उत्पन्न हुए. ये तीनों शब्द पिंड रूप में ‘ऊँ’ में विलीन हए तो सूर्य को स्थूल रूप मिला. सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होने से इसका नाम आदित्य पड़ा.

सूर्य ने माता की इच्छा पूर्ण करते हुए शत्रुओं का निर्दयता से दमन किया इसलिए सूर्य को क्रूर ग्रह कहा गया है न की दुष्ट या पापी. सूर्य की जन्म भूमि कलिंग देश, गोत्र कश्यप और जाति ब्राह्मण है. सूर्य गुड़ की बलि से, गुग्गल धूप से, रक्त चन्दन से, अर्क की समिधा से, कमल पुष्प से प्रसन्न होते हैं.

सूर्य के रथ में केवल एक पहिया है. सात अलग-अलग रंग के तेजस्वी घोड़े उसे खींचते हैं और उनका सारथी लंगड़ा है, मार्ग निरालम्ब है, घोड़े की लगाम की जगह सांपों की रस्सी है.

भगवान्‌ सूर्य की दो पत्नियां हैं संज्ञा और निक्षुभा. संज्ञा के सुरेणु, राज्ञी, द्यौ, त्वाष्ट्री एवं प्रभा आदि अनेक नाम हैं तथा छाया का ही दूसरा नाम निक्षुभा है. संज्ञा विश्वकर्मा त्वष्टा की पुत्री है. भगवान्‌ सूर्य को संज्ञा से वैवस्वतमनु, यम, यमुना, अश्विनी कुमार द्वय और रैवन्त तथा छाया से शनि, तपती, विष्टि और सावर्णिमनु ये दस संतानें हुई.

Facebook Comments