24 साल बाद बेदाग हुए नंबी नारायणन ने बयां किया दर्द : ISRO जासूसी मामला

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन ने कहा कि उन्हें जासूसी के झूठे मामले में फंसाने वाले षड्यंत्रकारी अलग-अलग उद्देश्यों वाले अलग-अलग लोग थे, लेकिन पीड़ित एक ही तरह के लोग थे। उच्चतम न्यायालय ने 1994 के जासूसी मामले में मानसिक यातना को लेकर  नारायणन को 50 लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने का निर्देश दिया था।

शीर्ष अदालत ने ‘मनगढ़ंत’ मामला बनाने, नारायणन की गिरफ्तारी और उन्हें भयानक प्रताड़ना व दुख पहुंचाए जाने को लेकर केरल पुलिस की भूमिका की  उच्चस्तरीय जांच कराए जाने का भी आदेश दिया था।  नारायणन के अनुसार, इसरो जासूसी मामला 20 अक्टूबर, 1994 को मालदीव की नागरिक मरियम रशीदा की गिरफ्तारी के समय से ही झूठा था। उस समय वह इसरो की क्रायोजेनिक परियोजना के निदेशक थे। रशीदा को इसरो के रॉकेट इंजनों से संबंधित गोपनीय दस्तावेज रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था जो कथित तौर पर पाकिस्तान को दिए जाने थे।

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नारायणन का कहना है कि यद्यपि मालदीवी महिला की गिरफ्तारी मामले की शुरुआत थी, लेकिन इसकी पटकथा तभी लिखी जा चुकी थी, जब उक्त महिला की त्रिवेंद्रम हवाई अड्डे पर 20 जून 1994 को के. चंद्रशेखर (रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के एक भारतीय प्रतिनिधि) से मुलाकात हुई। जब एक पुलिस निरीक्षक को मरियम रशीदा की डायरी में शशिकुमारन (इसरो की क्रायोजेनिक परियोजना के तत्कालीन उप निदेशक) का नाम मिला तो मामले में इसरो को घसीट दिया गया। उन्होंने कहा कि जब एक प्रमुख षड्यंत्रकारी को वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में इसरो की गति को धीमा करने का मौका मिल गया तो मैं शिकार बन गया। उन्होंने ये टिप्पणियां अपनी किताब में की हैं, जो हाल में ब्लूम्सबरी ने प्रकाशित की है।
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नारायणन को नवंबर 1994 में इसरो के अन्य वैज्ञानिकों तथा कुछ अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया था। तीन महीने बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया था। बाद में मामले की जांच करने वाले केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने केरल की एक अदालत में रिपोर्ट दायर कर कहा था कि जासूसी का मामला झूठा है और आरोपों को साबित करने वाला कोई साक्ष्य नहीं है। किताब ‘रेडी टू फायर : हाउ इंडिया एंड आई सरवाइव्ड द इसरो स्पाई केस’ में नारायणन और पत्रकार अरुण राम इसरो जासूसी मामले की एक-एक कड़ी को उधेड़ते हैं। नारायणन का कहना है कि मामले के पीछे निहित स्वार्थ थे, क्योंकि मामले के चलते भारत को क्रायोजेनिक इंजन का विकास करने में कम से कम 15 साल का विलम्ब हुआ।

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