जगननाथ मंदिर में आकर करें कृष्णा के अनेक रूपों का दर्शन…

श्री जगननाथ मंदिर जिसे हिन्दुओं के चार धामों में से एक माना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर में एक वार्षिक रथ यात्रा उत्सव होता है जो सारी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस मंदिर में तीन मुख्य देवताओं की मूर्तियां है, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा, ये तीनो ही तीन अलग-अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान होकर इस उत्‍सव में नगर की यात्रा पर निकलते हैं। यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है। जगन्नाथ मंदिर गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के लिये खास महत्व रखता है। इस पंथ के संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु कई वर्षों तक पुरी में रहे थे।

भगवान के प्रतीक

मंदिर के शिखर पर चक्र और ध्वज स्थित हैं। इसमें चक्र सुदर्शन चक्र का प्रतीक है जबकि लाल ध्वज भगवान जगन्नाथ इस मंदिर के भीतर हैं, इस बात का प्रतीक है। गंग वंश के हाल ही में मिले ताम्र पत्रों से यह ज्ञात हुआ है, कि वर्तमान मंदिर के निर्माण कार्य को कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने आरम्भ कराया था। मंदिर के जगमोहन और विमान भाग इनके शासन काल में ही बने थे। बाद में अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रूप दिया था। मंदिर का वृहत क्षेत्र 400,000 वर्ग फुट में फैला है और एक विशाल चहारदीवारी से घिरा है। कलिंग शैली के इस मंदिर में स्थापत्यकला और शिल्प के आश्‍चर्यजनक प्रयोग किए गए हैं।

मंदिर का स्‍थापत्‍य

मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है, जिसके शिखर पर विष्णु का श्री सुदर्शन चक्र अर्थात आठ आरों का चक्र बना है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है। मंदिर का मुख्य ढांचा एक 214 फीट ऊंचे पत्‍थर के चबूतरे पर बना है। इसके भीतर आंतरिक गर्भगृह में मुख्य देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। यह भाग इसे घेरे हुए अन्य भागों की अपेक्षा अधिक प्रभाव वाला है। इससे लगे घेरदार मंदिर की पिरामिडाकार की छत और लगे हुए मण्डप, अट्टालिकारूपी मुख्य मंदिर के निकट होते हुए ऊंचे होते चले गये हैं। मुख्य भवन एक 20 फीट ऊंची दीवार से घिरा हुआ है तथा दूसरी दीवार मुख्य मंदिर को घेरती है। एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तंभ, मुख्य द्वार के ठीक सामने स्थित है। इसके द्वार पर दो सिंहों की मूर्तियां निर्मित हैं।

मंदिर का इतिहास और कथा

शुरू में इस मंदिर में जगन्नाथ जी की पूजा सन 1558 तक होती रही। इसके बाद अफगान जनरल काला पहाड़ ने ओडिशा पर हमला किया और मूर्तियां तथा मंदिर के कई भाग ध्वंस कर दिए और पूजा बंद करा दी। मूर्तियों को चिलिका झील मे स्थित एक द्वीप मे रख दिया गया। काफी समय बाद रामचंद्र देब के स्वतंत्र राज्य स्थापित करने पर, मंदिर और इसकी मूर्तियों की पुनर्स्थापना हुई। इस मंदिर से जुड़ी एक परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अगरु वृक्ष के नीचे मिली थी।

यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूर्ति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की और भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक लकड़ी का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया, उसके बाद स्‍वयं विष्णु जी और विश्वकर्मा बढ़ई और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए, और कहा कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये।

माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगी। तब से जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की वही मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं।

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