धन और सफलता खुद बन जाते हैं उस घर के गुलाम…जहां होता है प्रेम

देवकी की चौखट पर तीन संत खड़े थे। उन्हें देखकर देवकी ने कहा, भीतर आकर भोजन करिए। एक संत ने पूछा, ‘क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?’ देवकी बोली, ‘नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।’

यह सुनकर संत बोले- ‘हम तभी भीतर आएंगे जब वह घर में हों।’ शाम को जब देवकी के पति आए तो उन्हें मामला पता चला। पति बोले- जाओ और संतों से कहो कि मैं आ गया हूं और उन्हें सम्मानपूर्वक घर के अंदर ले आओ। देवकी बाहर गई और तीनों संतों को आने के लिए कहा।

तब संत बोले, ‘हम किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।’ ‘पर क्यों?’ देवकी ने सवाल किया। उनमें से एक संत ने कहा- ‘मेरा नाम धन है और इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप तय करें कि भीतर किसे बुलाना करना है।’

देवकी ने पति को बताया तो वह प्रसन्न होकर बोला, ‘हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए।’ देवकी ने कहा, ‘मुझे लगता है कि हमें सफलता को बुलाना चाहिए।’ उनकी बेटी यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई और बोली, ‘हमें प्रेम को आमंत्रित करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है।’ माता-पिता ने उसकी बात मान ली।

देवकी घर के बाहर गई और उसने संतों से कहा, ‘आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया अंदर आकर भोजन ग्रहण करें।’ प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने लगे। देवकी ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा, ‘मैंने तो सिर्फ प्रेम को आमंत्रित किया था?’ उनमें से एक संत ने कहा, ‘यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक को बुलाया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता, धन और सफलता उसके पीछे-पीछे जाते हैं।

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