इस उम्र के हैं तो संभल जाएं हो सकता है काला मोतियाबिंद

एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक, काला मोतियाबिंद‘साइलेंट किलर’है. 40 साल की उम्र के बाद हर 20 में से एक व्यक्ति को इसका खतरा होता है.

क्या कहते हैं डॉक्टर-
एम्स स्थित डॉ राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र के प्रमुख प्रोफेसर अतुल कुमार का कहना है कि काला मोतियाबिंद ‘ग्लूकोमा’साइलेंट किलर है और यह उन लोगों को अधिक होने का खतरा होता है, जिनके परिवार में यह बीमारी किसी को हो चुकी हो.

इलाज है मुमकिन-
केंद्र की अन्य प्रोफेसर डॉ. रमनजीत सिहोता का कहना है कि काला मोतियाबिंद होने पर लोगों को लगता है कि उनकी आंखों की रोशनी चली जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं है. वक्त पर पता चलने और इलाज मिलने पर इसका इलाज मुमकिन है.

आंखों की रोशनी जाने का प्रमुख कारण-
आमतौर पर काला मोतियाबिंद के मरीज काफी देर से इलाज करवाते हैं जिससे कठिनाईयां बढ़ जाती हैं. इस बीमारी में एक बार आंख की रोशनी चली जाने के बाद उसे वापस नहीं लाया जा सकता है. यह देश में लोगों की आंखों की रोशनी जाने का एक प्रमुख कारण है.

40 की उम्र में खतरा अधिक-
40 साल की उम्र के बाद काला मोतियाबिंद होने की आशंका अधिक रहती है. देश में 40 साल से ज्यादा उम्र के हर 20 में से एक व्यक्ति को या तो काला मोतियाबिंद होता है या उसे होने की संभावना रहती है.

आंखों में तिरछापन हो तो तुरंत करवाएं इलाज-
बच्चों की आंखों में तिरछापन है तो इसका बचपन में ही उपचार करा लेना चाहिए. आगे जाकर आंखों का तिरछापन तो सीधा किया जा सकता है, लेकिन व्यक्ति की दोनों आंखों की एक साथ काम करने की क्षमता प्रभावित हो जाती है.

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