जानिए आखिर क्यों नहीं दिखते अब ऐसे चमत्कार…..

वे देवी देवती कहां गए जो बुलाने पर चले आते और इच्छित सुविधाओं को तत्काल रच देते थे। यह उल्लेख आज की दुनिया को सौ डेढ़ सौ साल पहले की दुनिया से तुलना करने वालों को भी हैरान कर सकते है।

उनके हिसाब से आज की दुनिया पिछली सदी से बहुत आगे है पर ईशा फाउंडेशन कोयंबटूर (तमिलनाडु) की प्रयोगशाला के नतीजों को देखें तो मानना होगा कि पांच हजार साल पहले की दुनिया के बारे में पुराणों और योगशास्त्रों में जो लिखा है, वह अधिकांश सही साबित हो रहा है।

फाउंडेशन के संस्थापक और योग की सचाइयों को दुनिया में पहुंचाने के मिशन में लगे सद्गुरु जग्गी वासुदेव का कहना है कि ऋग्वेद काल में तारों की सैर करने और वहां से लोगों के पृथ्वी पर आने के वृत्तांत सुनते आए हैं।

आकाश में रह कर धरती के लोगों के लिए सुख सुविधा रचने वालों के बारे में दुनियाभर की पुरानी किताबों के वर्णन इस बात की गवाही देते हैं। हिमालय के ध्रुव प्रदेश में तमाम ऐसी चीजें होते हुए आज भी देखी जा सकती हैं जो असंभव लगती है।

वास्तव में ऐसा कुछ नहीं हुआ होता, तो हर जगह लगभग एक जैसी कहानियां न बनी होती। बाइबल में खासकर यूनानी संस्कृति में भी ऐसे ही उल्लेख आए हैं। यहां तक कि नाम भी एक जैसे लगते है।

सुमेरियन संस्कृति, मेसोपोटामिया की संस्कृति, अरब की कुछ खास संस्कृतियों, अफ्रीका के उत्तरी भागों में और दक्षिण अमेरिका में भी यही बातें सुनने व पढ़ने को मिलती हैं।

हजारों सालों तक इन महाद्वीपों के बीच कोई संपर्क ही नहीं रहा है। इसके बावजूद इन जगहों पर एक जैसे शब्दों और मुहावरों का उपयोग मिलता है।

हिमालय को योगियों और सिद्धों का तीर्थ बताते हुए तिब्बती लामा जेन सामी का कहना है कि साधना की उच्च स्थिति में पहुंचे लोगों को आज भी इस तरह के अलौकिक अनुभव होते हैं।

सार यह है कि दुनिया हमेशा उसके रचयिता की तरह पूर्ण विकसित रही है। कभी कोई पक्ष सामने आता है, कभी कोई। लेकिन योग के सहारे उसे समग्र रूप में देखा और समझा जा सकता है।

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