मंदिर परिसर में नहीं है देवी की प्रतिमा,प्रसाद के रूप में मिलता है गीला वस्त्र

ये देश के अलग-अलग जगहों में बसे हैं, उन्ही में से एक असम के गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में स्थित है। यह मंदिर देवी रजस्वला को समर्पित है। मान्यता अनुसार यहां पर माता सती का गुह्वा मतलब योनि भाग गिरने से ही कामाख्या शक्तिपीठ की उत्पत्ति हुई। मान्यता अनुसार यह पीठ माता के सभी पीठों में से महापीठ माना जाता है। 

मंदिर परिसर में नहीं है देवी की प्रतिमा
मंदिर में देवी की कोई प्रतिमा नहीं है, यहां पर केवल देवी के योनि भाग की पूजा की जाती है। इसके बीच में एक कुंड है, जो हमेशा फूलों से ढंका रहता है। इसके अलावा परिसर के पास एक अन्य मंदिर स्थापित है जहां देवी की एक प्रतिमा स्थापित है।

प्रसाद के रूप में मिलता है गीला वस्त्र
यहां पर आने वाले हर भक्त को प्रसाद के रूप में एक गीला वस्त्र दिया जाता है, जिसे  अम्बुवाची वस्त्र कहा जाता है। एेसी मान्यता है कि देवी के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आस-पास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है और तीन दिन बाद जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीगा होता है जिसे भक्तों में प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है।

लुप्त हो चुका है मौलिक मंदिर
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में नरक नाम के एक असुर ने कामाख्या देवी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, क्योंकि देवी उनसे विवाह नहीं करना चाहती थी इसलिए उन्होंने उसके सामने एक शर्त रखी। शर्त के अनुसार नरक को एक रात में उस जगह पर घाट, मार्ग व मंदिर आदि सब की स्थापना करनी थी। नरक ने शर्त को पूरा करने के लिए भगवान विश्वकर्मा को आमंत्रित कर उनका आशीर्वाद ले काम शुरू कर दिया।

जब कामाख्या देवी ने नरक द्वारा काम पूरा होता देखा तो उन्होंने मुर्गे से सुबह होने से पूर्व ही बांघ दिलवा दी, जिससे शर्त पूरी न हो सकी और नरक की देवी से विवाह की इच्छा पूरी न हो सकी। इसी कारण यहां पर्वत के नीचे से ऊपर जाने वाले मार्ग को नरकारसुर के नाम से जाना जाता है। इसके आलवा जिस मंदिर में देवी की प्रतिमा स्थापित है उसे कामादेव मंदिर कहा जाता है।

मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि नरकासुर के अत्याचारों से कामाख्या के दर्शन में कई परेशानियां उत्पन्न होने लगी थीं, जिस बात से क्रोधित होकर महर्षि वशिष्ट ने इस जगह को श्राप दे दिया। जिस कारण समय के साथ कामाख्या पीठ लुप्त हो गया।

भैरव के दर्शन के बिना अधूरी है यात्रा
कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है, जहा इस शक्तिपीठ के भैरव विराजमान हैं। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में है, कहा जाता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

तंत्र विद्या का सबसे बड़ा मंदिर
कामाख्‍या मंदिर तंत्र विद्या का सबसे बढ़ा केंद्र माना जाता है और हर साल जून महीने में यहां पर अंबुवासी मेला लगता है। देश के हर कोने से साधु-संत और तांत्रिक यहां पर इकट्ठे होते हैं व तंत्र साधना करते हैं। माना जाता है कि इस दौरान मां के रजस्‍वला होने का पर्व मनाया जाता है और इस समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है।

 

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