सुरों की मल्लिका लता मंगेश्कर ने गालिब की इस कविता को किया था अमर

सिनेमा जगत में ऐसे कई दिग्गज है जिन्होनें अपने काम से देश दुनिया में ना सिर्फ अपनी पहचान कायम की बल्कि इस पूरी दुनिया को अपना बना लिया हम बात कर रहे है सुरों की मल्लिका लता मंगेश्कर की जी हां 28 सितंबर इंदौर में जन्मी लता का पूरा नाम हेमा हरिदकर है।करीब 7 दशकों तक हिंदी गानों की दुनिया पर राज करने वाली महारानी लता मंगेश्कर ने अब तक ने 30 हजार से ज्यादा गानों को अपनी आवाज दी है।

बता दें आज भारत रत्न स्वर कोकिला लता मंगेशकर 89 साल की हो गई हैं। लता दुनिया की वो मशहुर सिंगर है जिनके हर गाने ने देश दुनिया में अलग पहचान बनाई है उनके गाने ना सिर्फ भारत देश बल्कि पुरे विश्व में मशहुर है। लता मंगेशकर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर खुद एक बड़े क्लासिकल सिंगर और थियेटर आर्टिस्ट थे।वही लता ने उनसे ही क्लासिकल संगीत में रुचि दिखाई थी

बता दें लता ने महज 5 साल की उम्र से ही अपने पिता से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। लता को उनके थियेटर में लतिका के नाम से बुलाया जाता था। हजारों गीतों को सुरमयी आवाज से संवारने वाली लता ने महान शायर मिर्जा़ गा़लिब को भी आवाज का परिचय दिया था जिसके लिए लता ने 1969 में रिलीज हृदयनाथ मंगेशकर के एलबम में गा़लिब की यह गज़ल गाई थी।

ये गजल है-

नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का

काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ

सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का

सीना-ए-शमशीर से बाहर है दम शमशीर का…

जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिए

सीना-ए-शमशीर से बाहर है दम शमशीर का

आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए

मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का

 

मू-ए-आतिश दीदा है हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का…

बस-कि हूँ ‘ग़ालिब’ असीरी में भी आतिश ज़ेर-ए-पा

मू-ए-आतिश दीदा है हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का

आतिशीं-पा हूँ गुदाज़-ए-वहशत-ए-ज़िन्दाँ न पूछ

मू-ए-आतिश दीदा है हर हल्क़ा याँ ज़ंजीर का

शोख़ी-ए-नैरंग सैद-ए-वहशत-ए-ताऊस है

दाम-ए-सब्ज़ा में है परवाज़-ए-चमन तस्ख़ीर का

न’अल आतिश में है तेग़-ए-यार से नख़चीर का…

लज़्ज़त-ए-ईजाद-ए-नाज़ अफ़सून-ए-अर्ज़-ज़ौक़-ए-क़त्ल

न’अल आतिश में है तेग़-ए-यार से नख़चीर का

ख़िश्त पुश्त-ए-दस्त-ए-इज्ज़ ओ क़ालिब आग़ोश-ए-विदा’अ

पुर हुआ है सैल से पैमाना किस ता’मीर का

वहशत-ए-ख़्वाब-ए-अदम शोर-ए-तमाशा है ‘असद’

जो मज़ा जौहर नहीं आईना-ए-ताबीर का

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