क्या आपको पता है आखिर क्या है अडल्ट्री कानून? क्यों है इस पर विवाद?

आज सुप्रीम कोर्ट विवाहेत्तर संबंधों पर भी फैसला सुनाएगी। विवाहेत्तर संबंधों को लेकर 1860 में बना यह अडल्ट्री कानून (व्याभिचार कानून) करीब 150 साल पुराना है। इसक जिक्र आईपीसी की धारा 497 में किया गया है। इस कानून के मुताबिक अगर कोई मर्द किसी दूसरी शादीशुदा औरत के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, तो पति की शिकायत पर इस मामले में पुरुष को अडल्ट्री कानून के तहत दोषी माना जाता है। ऐसा करने पर पुरुष को पांच साल की कैद और जुर्माना या फिर दोनों ही सजा का प्रवाधान है।

हालांकि इस कानून का एक प्रावधान यह भी है कि अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी कुंवारी या विधवा महिला से शारीरिक संबंध बनाता है तो वह अडल्ट्री के तहत दोषी नहीं माना जाएगा।

विवाद क्यों 
पुरुष वर्ग की ओर से इस कानून पर आपत्ति दर्ज करवाई जाती रही है। सवाल उठता रहा है कि जब दो वयस्कों की सहमति से कोई विवाहेतर संबंध बनाए जाते हैं तो इसकी सजा सिर्फ एक पक्ष को क्यों दी जाए?

आज शीर्ष कोर्ट इस बात का फैसला करेगी कि आईपीसी की धारा 497 के तहत अडल्ट्री कानून के तहत पुरुष और महिला दोनों को बराबर सजा मिलनी चाहिए या नहीं।

सरकार का पक्ष
इटली में रहने वाले एनआरआई जोसेफ शाइन ने दिसंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। उन्होंने अपील की थी कि पुरुष और महिला दोनों को ही बराबर सजा मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार ने यह कहते हुए कानून का समर्थन किया है कि विवाह संस्था की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह कानून आवश्यक है। अडल्ट्री से जुड़े कानून को हल्का करने या उसमें बदलाव करने से देश में शादी जैसी संस्था खतरे में पड़ सकती है।

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