जैन धर्म मानने वाले लोग इस दिन क्षमा क्यों मांगते हैं!

जिनेन्द्र पारख ने हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर से वकालत की पढ़ाई की है. छत्तीसगढ़ के गांव राजनांदगांव से आते हैं. इनकी रुचियों में शुमार है – समकालीन विषयों पर पढ़ना, लिखना, इतिहास पढ़ना एवं समझना. छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रामचन्द्र सिंहदेव की याद में उन्होंने दी लल्लनटॉप के लिए एक लेख लिखा है. सारी फोटोज़ भी जिनेन्द्र पारख ने ही उपलब्ध करवाई हैं.

# पर्युषण पर्व क्या होता है? क्यों इसे जैनों का सबसे बड़ा पर्व कहा जाता है ?

आप सभी ने कभी न कभी अपने जैन दोस्तों से इनमें से कुछ सवाल जरूर पूछे होंगे – तुम जैन लोग आलू प्याज क्यों नहीं खाते हो ? तुम सूरज ढ़लने के बाद खाना क्यों नहीं खाते या फिर यह पर्युषण पर्व क्या होता है ? आइये जानते है जैनो के महा पर्व पर्युषण के बारे में.

# क्या है पर्युषण पर्व ?

जैस हिन्दू धर्म में नवरात्रि, दिवाली, मुस्लिम धर्म में ईद मनाई जाती है ठीक उसी प्रकार जैन धर्म में पर्युषण पर्व को मुख्य रूप से मनाया जाता है. पर्युषण पर्व का जैन समाज में सबसे अधिक महत्‍व है. इस पर्व को पर्वाधिराज (पर्वो का राजा) कहा जाता है. पर्युषण पर्व आध्‍यात्मिक अनुष्‍ठानों के माध्‍यम से आत्‍मा की शुद्धि का पर्व माना जाता है. इसका मुख्‍य उद्देश्‍य आत्‍मा के विकारों को दूर करने का होता है जिसका साधारण शब्दों में मतलब होता है किसी भी प्रकार के किये गए पापों का प्रायश्चित करना. अब पाप का मतलब आपके द्वारा किये गए कोई भी कार्य जिससे किसी भी प्राणी को दुःख पंहुचा हो.

# क्या करते है जैन इस पर्व में ?

पर्युषण महापर्व-आत्मा शुद्धि का पर्व है. यह पर्व 8 दिन तक मनाया जाता है जिसमें किसी के भीतर में ताप, उत्ताप पैदा हो गया हो, किसी के प्रति बुरी भावना पैदा हो गई हो तो उसको शांत करने का यह पर्व है. मंदिर एवं धर्म स्थलों पर ध्यान होता है, जैन पद्धति के अनुसार पूजा पाठ भी किया जाता है.

क्षमायाचना का पर्व है पर्युषण.

# अंतिम दिन मनाया जाता है क्षमा पर्व.

पर्युषण महापर्व का समापन मैत्री दिवस के रूप में आयोजित होता है, जिसे ‘क्षमापना दिवस’ भी कहा जाता है. इस तरह से पर्युषण महापर्व एवं क्षमापना दिवस एक-दूसरे को निकट लाने का पर्व है. यह एक-दूसरे को अपने ही समान समझने का पर्व है. गीता में भी कहा गया है- ‘आत्मौपम्येन सर्वत्र:, समे पश्यति योर्जुन’. श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा

हे अर्जुन! प्राणीमात्र को अपने तुल्य समझो.

संसार के समस्त प्राणियों से जाने-अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमा याचना कर सभी के लिए ख़ुशी की कामना की जाती है. भगवान महावीर ने क्षमा यानी समता का जीवन जीया. वे चाहे कैसी भी परिस्थिति आई हो, सभी परिस्थितियों में सम रहे. भगवान महावीर के अनुसार

क्षमा वीरों का भूषण है.

महान व्यक्ति ही क्षमा ले-दे सकते हैं. पर्युषण पर्व आदान-प्रदान का पर्व है. अतः अंतिम दिन बड़े, छोटे, आमिर, गरीब, श्वेताम्बर, दिगंबर एक दूसरे से क्षमा मांगकर एक नए रिश्ते की शुरुआत करते है.

दिगंबर और श्वेताम्बर दोनों पंथ होते हैं शामिल.

# एक और सार्थक अर्थ है पर्युषण का

मनुष्य धार्मिक कहलाए या नहीं. आत्मा-परमात्मा में विश्वास करे या नहीं. पूर्वजन्म और पुनर्जन्म को माने या नहीं. अपनी किसी भी समस्या के समाधान में जहां तक संभव हो, अहिंसा का सहारा ले. यही पयुर्षण का अर्थ है. इसके साथ-साथ जब हम सच बोलते हैं, जब हम समस्त जीवों के प्रति दया भाव रखते है, जब हम विपरीत परिस्थिति में भी हिम्मत नहीं हारते. जब अपने दोस्त की मदद करते हैं, जब परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी निभाते है ,जब हम निरंतर लक्ष्य की ओर अग्रसर होते है, जब हम आत्म निरीक्षण करते है, जब हम मुस्कुराते है, जब हम मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाते है आदि तब पर्युषण होता है. कम या ज़्यादा, जैन हो या अजैन, पर्युषण का सही अर्थ सिर्फ मनावता और इंसानियत को समझना है. इस पर्व में हाथ जोड़कर क्षमा मांगने में संकोच न करे और टूटे रिश्तों को एक बार फिर से मजबूत करे, बस यही तो पर्युषण है.

बदला तो दुश्मन लेते है.

हम तो माफ करके,

दिल से निकाल देते है.

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