मनुष्य की तरह बोलने वाली मैना विलुप्ति के कगार पर….

छत्तीसगढ़ में अबूझमाड़, बैलाडिला, ओरछा, छोटे डोंगर, बारसूर और कुटमसरे की पहाड़ियां पहाड़ी मैना का प्राकृतिक वास हुआ करती थीं, लेकिन अब यहां पहाड़ी मैना नजर नहीं आती।

पहाड़ी मैना अब विलुप्ति के कगार पर है। हूबहू इंसान की तरह बोल पाने की उसकी दुर्लभ क्षमता ही उसकी दुश्मन साबित हुई। मैना को पिंजरे में कैद कर मन बहलाने वालों ने उसे पाने की चाहत में आगे-पीछे कुछ नहीं सोचा। बस्तर के जंगलों से दूर देसी-विदेशी शहरों तक इसकी खरीद-फरोख्त का धंधा खूब चला।

हथेलीभर जितनी छोटी यह चिड़िया कभी बस्तर के हरे भरे पहाड़ों पर खूब मिलती थी। इसे सारिका, बस्तरिया मैना या पहाड़ी मैना कहते हैं। मैदानों में पाई जाने वाली कोंदी या गूंगी मैना से यह थोड़ी अलग है। इसके डैने पर एक सफेद चित्ता रहता है और आंखों के पीछे से गुद्दी तक फीते की तरह पीली खाल बढ़ती रहती है। आप इसकी विलक्षणता पर एक बार तो सहसा यकीन भी नहीं करेंगे।

हर हर आवाज की हूबहू नकल करती है। यह तोते की तरह अपनी आवाज में नहीं, बल्कि मनुष्यों की आवाज में बोलती है। इंसान की आवाज को उसी आरोह-अवरोह व ध्वनि बल से बोलने वाली इस पहाड़ी मैना की यही खूबी इसकी जान की दुश्मन बन बैठी।

छत्तीसगढ़ का यह राजकीय पक्षी पिछले कुछ दशकों में बड़ी खामोशी से गुम हो गया। संरक्षण के तमाम उपाय नाकाफी साबित हुए। अब हालात इतने खराब हो चले हैं कि जगदलपुर के स्थित संरक्षण केंद्र में एक तंग पिंजरे में रखी इकलौती पहाड़ी मैना ने भी बोलना छोड़ दिया है। पहले वह चहक उठती थी, …साहब, नमस्ते, मैं पायल बोल रही हूं…, लेकिन अब अकेलेपन का शिकार है। इस मैना को जिस जगह पिंजरे में रखा गया है वहां एक ओर हाइवे है तो दूसरी ओर रेल लाइन। विशेषज्ञ मानते हैं कि इतने शोरगुल में मैना का प्रजनन व संरक्षण संभव ही नहीं। हालही जंगल में घायल पड़ी दो शिशु मैना मिली थीं, जिन्हें भी यहां एक छोटे पिंजरे में रखा गया है।

इसके संरक्षण और प्रजनन की कोशिशें 1990 से की जा रही हैं। हालांकि पांच करोड़ रुपए फूंकने के बाद भी हासिल कुछ नहीं हुआ। जगदलपुर के पिंजरे में रखी चार में से तीन मैना सर्पदंश का शिकार हो गईं। अब अकेली मैना ही बची है। वन विभाग के अफसरों का कहना है कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के जंगलों में कभी-कभार मैना का झुंड अब भी दिख जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम-ग्रेकुला रिलिजियोसा पेनिनसुलारिस है। पहाड़ी मैना की दूसरी प्रजातियां श्रीलंका, चीन, फिलीपींस, थाईलैंड आदि देशों में भी पाई जाती हैं। थाईलैंड में मैना के प्रजनन की कोशिशें सफल रही थीं, लिहाजा वहां के पक्षी वैज्ञानिकों को भी बस्तर बुलाया गया, लेकिन प्रजनन की कोशिशें यहां सफल नहीं हो पाईं।

जंगल में पहले कभी-कभी मैना की आवाज सुनाई दे जाती थी, अब तो इसे देखने के लिए पिंजरे तक ही जाना होगा। इसके संरक्षण की बहुत जरूरत है, गंभीर प्रयास तेजी से करने होंगे। यह कुदरत का अनमोल तोहफा है, इसके संरक्षण के लिए सभी को जागना होगा।

मैना का प्रजनन काल फरवरी से मई के बीच होता है। यह बैंगनी-गुलाबी रंग के अंडे देती है। मैना के प्रजनन के लिए अब जंगल के अंदर 50 लाख रुपये लागत का बड़ा पिंजरा बनाने की योजना बनाई गई है। हालांकि बड़ा पिंजरा बनाने की योजना तीन साल से चल रही है, जिसपर अब तक अमल नहीं हो पाया।

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