यहाँ दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1 हजार 11 दीपक जलाये जाते हैं…..

ये दीप स्तंभ लगभग 51 फीट ऊंचे हैं। दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं। मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी। विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार साल पुराना है। इस दृष्टिकोण से ये दीप स्तंभ लगभग 2 हजार साल से अधिक पुराने हैं।

हरसिद्धि मंदिर प्रबंध समिति के प्रबंधक अवधेश जोशी ने बताया कि पहले केवल नवरात्रि में तथा कुछ प्रमुख त्योहारों पर ही दीप स्तंभ जलाए जाते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से श्रृद्धालुओं का सहयोग मिलने से हर रोज ये दीप स्तंभ जलाए जाते हैं।

51 फीट ऊंचे व तेल से सने हुई दीप स्तंभों पर चढ़कर हजारों दीपकों को जलाना सहज नहीं है, लेकिन उज्जैन निवासी जोशी परिवार लगभग 100 साल से इन दीप स्तंभों को रोशन कर रहा है। वर्तमान में मनोहर व राजेंद्र जोशी इस परंपरा को कायम रखे हुए है। इनका साथ देते हैं रामचंद्र फुलेरिया व ओमप्रकाश चौहान। दोनों दीप स्तंभों को एक बार जलाने में लगभग 4 किलो रूई की बाती व 60 लीटर तेल लगता है। समय-समय पर इन दीप स्तंभों की साफ-सफाई भी की जाती है।

हरसिद्धि मंदिर के ये दीप स्तंभ श्रृद्धालुओं के सहयोग से जलाए जाते हैं। इसके लिए हरसिद्धि मंदिर प्रबंध समिति में पहले बुकिंग कराई जाती है। प्रमुख त्योहारों जैसे- शिवरात्रि, चैत्र व शारदीय नवरात्रि, धनतेरस व दीपावली पर दीप स्तंभ जलाने की बुकिंग तो साल भर पहले ही श्रृद्धालुओं द्वारा करवा दी जाती है। कई बार श्रृद्धालु की बारी आते-आते महीनों लग जाते हैं। पहले के समय में चैत्र व शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि तथा प्रमुख त्योहारों पर ही दीप स्तंभ जलाए जाते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से श्रृद्धालुओं का भरपूर सहयोग मिलने से रोज दीप स्तंभ जलाए जाते हैं।

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