मिथिलांचल में मखाना की खेती करने वाले किसान परेशान ,कारण मार्केटिंग में आनेवाली बाधाएं

बिहार में मिथिलांचल अपने खान-पान को लेकर अलग पहचान रखती है। हालांकि, मिथिला की पहचान में शुमार पान, मखाना और मछली तीनों का उत्पादन काफी प्रभावित हुआ है। मिथिलांचल में मखाना की खेती करने वाले किसान परेशान हैं जिससे उत्पादन में भी कमी आई है। उत्पादन में कमी का मुख्य कारण मार्केटिंग में आनेवाली बाधाएं हैं।

 

आंकड़ों की मानें तो, बिहार की 13 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मखाना की खेती होती है। बिहार के दरभंगा क्षेत्र में मखाना उत्पादन को देखते हुए मखाना अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई। इस केंद्र के स्थापित होने के बाद मखाना की खेती में बदलाव जरूर आया है। मगर बाजार नहीं मिल पाने के कारण किसान परेशान हैं। दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया, किशनगंज, अररिया सहित 10 जिलों में मखाना की खेती होती है। देश में बिहार के अलावा असम, पश्चिम बंगाल और मणिपुर में भी मखाने का उत्पादन होता है, मगर देशभर में मखाने के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है।

 

मखाना अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. राजवीर के अनुसार मिथिलांचल और इसके आसपास के इलाकों में प्रतिवर्ष 13 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में मखाना की खेती होती है, इसमें 90 हजार टन बीज का उत्पादन होता है। इतने बीज से किसान लगभग 35 हजार टन लावा तैयार करते हैं। डॉ. राजवीर  ने बताया कि मखाना की खेती पारंपरिक रूप से तालाबों में की जाती है, लेकिन हाल के दिनों में अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने एक नई प्रजाति ‘स्वर्ण वैदेही’ विकसित किया है, जिसकी खेती खेतों में भी की जा सकेगी।

 

कृषि वैज्ञानिक डॉ़ लोकेंद्र कुमार और डॉ. विनोद कुमार ने शोध में इस प्रजाति की खोज की है। उनका कहना है कि अब खेतों में ही एक फीट जलभराव कर मखाना उत्पादन किया जा सकता है। आमतौर पर मखाना की फसल तैयार होने में 10 महीने का समय लगाता है, लेकिन इस विधि से फसल भी जल्द तैयार होगी और उत्पादन में भी वृद्धि होगी।

 

मखाना के प्रसिद्ध व्यवसायी राजकुमार सहनी ने बताया कि मिथिलांचल का मखाना देश से निर्यात होता है, लेकिन उसका लाभ यहां के किसानों को नहीं मिलता। उनका कहना है कि मखाना के निर्यात से देश को प्रतिवर्ष 22 से 25 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। उन्होंने बताया कि यहां के व्यापारी मखाना दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश भेजते हैं।

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