मोदी सरकार में 60 फीसदी और गंदी हुई गंगा..

हिंदुस्तान चाँद तक पहुंच रहा है और गंगा………गंगा अब पाताल में भी नहीं समा सकती.. 

भारत की सबसे पावन नदी गंगा, मोक्षदायिनी गंगा, जीवन देने वाली गंगा, नमामि गंगे प्रोजेक्ट की मोहताज हो गई ये ही एक शर्मनाक बात है. खेर हुई तो हुई पर अब नमामि गंगे के अंतर्गत सफाई की बजाय गंगा को कूड़ेदान बना दिया गया. ज़मानेभर के प्लास्टिक, कंकाल, कूड़ा-करकट, मल-मूत्र और देश की तमाम फैक्ट्रिया अपनी गंदगी को गंगा में मोक्ष दिला रही है. वो जल जिसके पीने से धर्मानुसार पाप मर जाता था और विज्ञान के तर्क की माने तो रोग नष्ट हो जाते थे आज जहर बन गया है.

अब जरा प्रयोगशालाओं के परीक्षण पर नज़रे दौड़ाये. मोदी के वाराणसी के घाटों पर गंगा के पानी में बैक्टीरिया चार साल (मोदी का कार्यकाल) पहले की तुलना में बढ़ गया है. ये रिपोर्ट ‘नमामि गंगे’  प्रोजेक्ट के समय की ही है जो फ़िलहाल जारी है. गंगा के पानी में विष्ठा कोलिफॉर्म बैक्टीरिया 58 फीसदी बढ़ गया है. 1000 मिलीलीटर पानी में 2,500 से ज्यादा कोलिफॉर्म माइक्रोऑर्गेनिज्म्स की मौजूदगी इसे नहाने के लिए असुरक्षित बना देती है. गंगा के पानी के नमूने में बैक्टीरिया दूषण आधिकारिक मानकों से 20 गुना अधिक है. RTI से दिए जवाब में सरकार ने माना है कि साल 2017 में ब्रिज के पास से लिए गए पानी के नमूने में विष्ठा कोलिफॉर्म बैक्टीरिया प्रति 100 मिलीलीटर में 49,000 पाए गए, जबकि 2014 में यहीं आकंड़ा प्रति 100 मिलीलीटर 31,000 का था.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डेटा का हवाला देते हुए बताया- ‘वाराणसी में गंगा नदी में मोटे तौर पर पांच नाले मिलते हैं जिनसे हर दिन दस लाख लीटर से ज्यादा बहाव आता है.’ गंगा में नाले मिल रहें है ये बात हजम करने की आदत देश अब डाल चूका है. क्योकि अब गंगा एक पावन नदी नहीं है जिसे माँ गंगा कहा जाता था. अब वो विकासशील भारत का वो कूड़ादान बन चुकी है, जिसमे इंसानी लाश से लेकर मवेशियों के चमड़े के कारखानों का पानी और जानलेवा प्लास्टिक से लेकर घर से निकलते नालों तक के मुहाने जोड़ दिए गए है.

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