यदि आपको भी है मुर्गा और अंडा खाने का शौक तो एक बार यह खबर अवश्य पढ़ें….

राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग शोध संस्थान (नीरी) के निदेशक डा। राकेश कुमार ने हरियाणा स्थित देश के सात बड़े मुर्गी फार्म में पर्यावरण संबंधी हालात का अध्ययन किया।

अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, छोटे आकार के पिंजरों में रखे गये मुर्गे- मुर्गियां भीषण गंदगी से फैलने वाले इंफेक्शन के शिकार होने के कारण इसका असर इनके अंडे और मांस में भी पाया गया है। वहीं, बड़े आकार वाले मुर्गी फार्म में खुले में रखे गये मुर्गे-मुर्गियां इस प्रकार के इंफेक्शन से बचे हैं। रिपोर्ट में छोटे पिंजरों की गंदगी के अलावा अंडे और मुर्गों को बाजार तक ले जाने के अमानवीय तरीके को भी इस समस्या का दूसरा प्रमुख कारण बताया गया है।

मुर्गी पालन से जुड़े विशेषज्ञ डॉ संतोष मित्तल ने नीरी की रिपोर्ट में उजागर हुए तथ्यों को मुर्गी पालन केंद्रों की जमीनी हकीकत बताया। डॉ मित्तल ने बताया कि मुर्गी पालन में पिंजरे के इस्तेमाल की अवधारणा यूरोप से ली गई है, जहां छोटे मुर्गी पालन केंद्र होते है। जबकि भारत में अब काफी बड़े पैमाने पर हजारों की संख्या में पक्षी रखे जाने वाले मुर्गी पालन केंद्र कार्यरत है। इसलिए भारत में कम से कम सौ से अधिक पक्षी वाले मुर्गी फार्म में पिंजरे का इस्तेमाल न तो सुरक्षित है ना ही व्यहारिक है।

नीरी के वैज्ञानिकों ने इस साल फरवरी से मई तक करनाल और सोनीपत के तीन-तीन और गुरुग्राम के एक मुर्गी फार्म का जायजा लिया। इनमें से सिर्फ गुरुग्राम स्थित 24 एकड़ क्षेत्रफल में बने मुर्गी फार्म में पक्षियों को बर्ड नेट और बड़े पिंजरों में रखा गया है। शेष छह फार्म में बेहद छोटे पिंजरों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

भारतीय मानकों के मुताबिक मुर्गी फार्म में प्रत्येक मुर्गे के लिये कम से कम 450 वर्ग सेंमी जगह होना चाहिये। जबकि इन फार्मों में पिंजरों में बंद मुर्गे-मुर्गियों मानक से पांच गुना कम जगह मिल पा रही है। नतीजतन, भूसे की तरह पिंजरों में बंद पक्षी ठीक से गर्दन भी नहीं उठा पाते हैं। इससे न सिर्फ इनकी गर्दन की हड्डी टूटी पायी गयी बल्कि आपस में रगड़ने से पंख टूटने और इससे शरीर पर हो रहे जख्म पक्षियों में इंफेक्शन का कारण बन रहे हैं।

इसके अलावा पिंजरों में बंद पक्षियों के भोजन पानी में मल-मूत्र का मिलना और इससे उपजी भीषण दुर्गंध, इंफेक्शन की दूसरी वजह बन रहा है। यही स्थिति चूजों के पालन-पोषण में भी देखी गयी है।

रिपोर्ट के मुताबिक चूजों को दी जाने वाली जरूरी एंटीबायोटिक दवाओं में कमी और टीकाकरण का अभाव इनकी मृत्यु दर में 0।5 प्रतिशत का इजाफा कर रहा है।

छोटे पिंजरों में पक्षियों को भरकर बाजार भेजने के दौरान मुर्गे-मुर्गियों को लगने वाली चोट पक्षियों की पीड़ा और इंफेक्शन की समस्या को चरम पर पहुंचा देती है। पक्षियों के जख्मी हालत में पाये जाने का सबूत इनके अंडों के खोल में लगे खून के धब्बों से भी मिलता हैं। इतना ही नहीं, इंफेक्शन और जख्म से मरने वाले पक्षियों के शव को नष्ट करने में भी मानकों का पालन न होना मुर्गी फार्म में प्रदूषण का कारण बन रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, संक्रमित और बीमार पक्षियों को दी जा रही एंटीबायोटिक दवाओं की अधिक मात्रा के नकारात्मक असर के खतरे की जद में मुर्गी उत्पादों का उपभोग करने वाले भी है। खासकर तंग पिंजरों में गंदगी जनित इंफेक्शन के शिकार ब्रायलर चिकन और फार्म के अंडे खाने वालों में एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होने का और इंफेक्शन  से होने वाली बीमारियों का खतरा बताया गया है।

 

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