नवरात्र की प्रथम देवी शैलुपुत्री की इस तरह करें आराधना……

नवरात्र के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-उपासना की जाती है।
नवरात्र की प्रथम देवी शैलुपुत्री मानव मन पर अपनी सत्ता रखती हैं। उनका चंद्रमा पर भी आधिपत्य माना जाता है। देवी शैल पुत्री का वर्णन हमें ब्रह्म पुराण में मिलता है। मां शैलपुत्री देवी पार्वती का ही रूप हैं। शैलराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री रखा गया था,जो शिव की अद्र्धांगिनी बनीं।

मां शैलपुत्री पूजा विधि
नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है। इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और कलश में उन्हें विराजने हेतु आह्वान किया जाता है। कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है।

कलश स्थापना के पश्चात देवी का आह्वान किया जाता है कि हे मां दुर्गा! हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें।’
इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है। इसे जयन्ती कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है- “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”

 

 

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