वैशाली गाँव में ‘निपाह वाइरस’ने ली कई लोगों की जान …..

माना जाता है कि चमगादड़ यहां 15वीं शताब्दी में तिरहुत के एक राजा शिव सिंह द्वारा निर्मित तालाब के आसपास के सेमर, पीपल आदि पेड़ों पर रहते हैं. तालाब सूखने की स्थिति में वहां जल का प्रबंध तत्काल किया जाता है. आसपास के फलदार वृक्षों से फल तोड़कर उनके खाने का भी प्रबंध किया गया .

जानलेवा ‘निपाह वाइरस’ का मुख्य कारण चमगादड़ को  माना जा रहा है. हालांकि रिपोर्ट इसका विरोधभास उत्पन्न्न कर रही है. इस सब के बीच बिहार के वैशाली जिले का एक गांव जिसमे आज भी चमगादड़ों को गांव का रक्षक मानकर उसकी पूजा की जाती है.  बिहार सरकार और केंद्र सरकार ने अडवाइजरी जारी कर लोगों को चमगादड़ों और सुअरों से दूर रहने को कहा है. अब यहां के लोग असमंजस में है. वैशाली के राजापाकर प्रखंड के सरसई गांव में लोग चमगादड़ों को गांव का रक्षक और समृद्धि का प्रतीक मानकर पूजा करते हैं. इस गांव और इसके आसपास के क्षेत्रों में करीब 50,000 से ज्यादा चमगादड़ों का वास है. ग्रामीणों का तो दावा है कि इन चमगादड़ों में कई का वजन पांच-पांच किलोग्राम तक है.

सरसई के सरपंच और बिहार सरपंच संघ के अध्यक्ष अमोद कुमार निराला ने कहा कि इस गांव के आसपास के क्षेत्रों में कुछ दशक पूर्व प्लेग और हैजा जैसी बीमारी महामारी का रूप ले ली थी, लेकिन इस गांव में यह बीमारी नहीं पहुंच सकी थी. तब यह माना गया था कि इन चमगादड़ों के वास के कारण ही इस गांव में बीमारियां नहीं पहुंच पाई. इसके बाद ये चमगादड़ यहां के ग्रामीणों के लिए भाग्यशाली माने जाने लगे. उन्होंने बताया कि यहां के चमगादड़ों को मारना या नुकसान पहुंचाना गांव के लोगों के लिए पूरी तरह निषेध है. हमारे पूर्वज भी यही कहा करते थे कि इनको नुकसान पहुंचाना गांव के लिए शुभ नहीं होगा.  गांव के लोग भी इनकी सुविधा का ख्याल रखते हैं.

ग्रामीण इंद्रजीत नारायण सिंह ने कहा कि किसी अनजान के प्रवेश के बाद ये चमगादड़ शोर मचाना शुरू कर देते हैं, जबकि गांव के लोगों के वृक्ष के पास जाने के बाद वे शांत रहते हैं. बहरहाल, वर्षों पुरानी परंपरा और हाल के दिनों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी किए गए अडवाइजरी के बाद यहां के लोग चमगादड़ को लेकर ऊहापोह की स्थिति में हैं. ग्रामीण यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि जो चमगादड़ उनके आस्था का प्रतीक हैं, आज वही उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कैसे हो सकते हैं?

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