इलाज न हो पाने के कारण हुई थी पति की मौत,आज खड़ा किया हॉस्पिटल…..

सुभाषिनी मिस्त्री के अतीत की बात करें तो वो जब यौवन की दहलीज पर थी, यानि की मात्र 23 साल की उम्र में ही उनके पति उन्हें और इस संसार को छोड़कर चले गए। उनका जन्म 1943 में कोलकाता में उस वक्त हुआ था, जब पूरा राज्य भीषण अकाल के दौर से गुजर रहा था। बता दें कि सुभाषिनी के 14 भाई-बहन थे, जो कि उस वक्त अकाल के कारण बेमौत मारे गए। और बहुत ही कम उम्र में सुभाषिनी की भी शादी हो गई, उनके चार बच्चे हैं।

फिर 1971 में सुभाषिनी के पति को गरीबी के कारण इलाज नहीं मिल सका और उन्होंने दम तोड़ दिया। इस हादसे से उन्हें गहरा सदमा लगा और तभी उन्होंने गरीबों के लिए कुछ करने की ठान ली। बता दें कि उस वक्त तक उन्हें अपना गुजारा सब्जी बेचकर और जूते पॉलिश करके करना पड़ता था, जिसमें कि एक महिला होकर भी जूते पॉलिश करना शायद बहुत हिम्मत और हौसले की बात है। ये काम करते हुए ही उन्होंने गरीबों के लिए फ्री अस्पताल बनाने का फैसला किया।

सबसे बड़ी बात कि इतनी गरीबी में पलते हुए और चार संतानों को पालते हुए उन्होंने अस्पताल बनाने के बारे में सोचा। जिसके लिए उन्हें कड़ी मशक्त करनी पड़ी। करीब बीस सालों तक एक-एक पाई जोड़कर 1992 में सुभाषिनी ने हंसपुकुर गांव में लौटकर 10,000 रुपये में एक एकड़ जमीन खरीदी। उसके बाद एक अस्थाई शेड से इसकी शुरुआत हुई और लाउडस्पीकर की मदद से शहर में डॉक्टर्स से फ्री सेवा की विनती की गई।

पश्चिम बंगाल के हंसपुखुर में उनका अस्पताल है। सुभाषिनी ने अपने बेटे को अनाथालय भेजा था, जो की बाद में एक डॉक्टर बने और अब वो इसी अस्पताल में गरीबों का इलाज करते हैं। पहले दिन यहां 252 का इलाज हुआ और अब यह अस्पताल लगातार आगे बढ़ रहा है. अब यह 9000 स्कवायर फीट में बना हुआ है। सुभाषिनी अभी 24 घंटे सुविधाएं देना चाहती है. यहां गरीबों का फ्री में इलाज होता है। गरीबी रेखा के ऊपर के लोगों से 10 रुपए की फीस ली जाती है. लेकिन आज सुभाषिनी मिस्त्री कहती है जिस दिन यह अस्पताल सर्व-सुविधा संपन्न हो जाएगा, उस दिन उन्हें चैन मिलेगा।

और उनके इस महान काम के लिए उन्हें हाल ही में मोदी सरकार की तरफ से पद्म श्री भी दिया गया है। सभाषिनी मिस्त्री एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने खुद गरीबी में अपना जीवन काटकर लोगों की सेवा की है। इनसे खासकर गरीबी में जी रहे लोगों को सीखना चाहिए, कि अगर इरादे बुलंद हो तो गरीबी जैसा शब्द भी बहुत छोटा लगता है। समाज में ऐसी मिसाल विरले ही मिलती है।

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