जानिए आखिर क्यों तेल की कीमतों को कम करने के मूड में नहीं सरकार….

जानकारों के मुताबिक, तेल की बढ़ती कीमतों से सरकार भले ही चिंतित है लेकिन इसके बावजूद एक्साइज ड्यूटी में कटौती जैसे कदम उठा कर राहत देने का सरकार का कोई इरादा नहीं है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इससे कल्याणकारी योजनाओं के लिए फंड जुटाने और राजस्व इकट्ठा करने पर बुरा असर पड़ेगा। इसका महंगाई पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है, जो फिलहाल थोड़ा काबू में है।

सरकार का मानना है कि बाजार को ध्यान में रखे बिना ऐसा कोई भी कदम उठाना उचित नहीं होगा। हालांकि, पिछले दो दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में दो डॉलर प्रति बैरल की गिरावट आई है। सऊदी अरब और रूस का कहना है कि वो दो साल के लिए प्रॉडक्शन में कटौती की डील पर राजी हो सकते हैं।

कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने और वहां नई सरकार के गठन के बाद अब उपभोक्ताओं को तत्काल राहत देने की कोई सियासी मजबूरी भी नहीं है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नवंबर में चुनाव होने हैं। ऐसे में सरकार के पास तेल कीमतों में सुधार होने तक के लिए पर्याप्त समय है।

2014 में बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ बढ़ती तेल कीमतों को मुद्दा बनाया था, लेकिन वर्तमान हालात में बीजेपी सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर विपक्ष के तीखे तेवरों का सामना कर रही है। वर्ल्ड बैंक ने इस साल एनर्जी कमॉडिटीज जैसे कि कच्चा तेल, गैस और कोयले की वैश्विक कीमतों में 20% इजाफे का अनुमान लगाया है।

चुनाव से पहले सरकार कल्याणकारी योजनाओं में ज्यादा खर्च करने की तैयारी में है, ऐसे में राजस्व में कटौती का कदम उठाने के लिए वह तैयार नहीं दिखती।

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