प्रदोष व्रत करने से आपकी मनोकामना पूरी होगी …..

प्रदोष काल त्रयोदशी के दिन शाम के समय को कहा जाता है। हर दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत का फल अलग-अलग होता है। शनिवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत से पुत्र की प्राप्ति होती है। इसके अलावा शनिवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत धारण करने से नौकरी-व्यापार में पदोन्नति और तरक्की होती है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होने के कारण इस दिन भोलेनाथ की पूजा करनी चाहिए। प्रदोष व्रत में प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक करना अत्यंत शुभफलदायी होता है।

 

प्रदोष व्रत पूजन विधि
सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है, तो आप शिवजी की मूरत की पूजा कर सकते हैं।

ध्यान रहे कि इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। इस दिन प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की (बेलपत्र), गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।

 

शनि प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से परिपूर्ण था। वह अत्यंत दयालु था। उसके यहां से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को झोली भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी खुद काफी दुखी थे। वे दुखी इसलिए थे क्योंकि उन्हें संतान नहीं था। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्र पर जाने का निश्‍चय किया और अपने कामकाज सेवकों को सौंप चल पड़े।

 

अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नही टूटी।

मगर सेठ पति-पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे । सेठ पति-पत्‍नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्काए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूं वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं।’

 

साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि बतायी। तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। कुछ समय बाद सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया। शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया । दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे

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