जानिये बलात्कारियों को फांसी की सजा दिलाने की सबसे पहले वकालत किसने की …..

क्या आपको पता है कि देशभर में बलात्कार की घटनाओं के बीच सबसे पहले मौत की सजा की मांग किसने की थी? चलिए हम आपको बताते हैं उस वकील के बारे में जिसने बलात्कारियों को फांसी की सजा दिलाने की सबसे पहले वकालत की थी।

देशभर में रेप और बलात्कार की घटनाओं के बीच पॉक्सो एक्ट में बदलाव को मंजूरी मिल चुकी है। केंद्रीय कैबिनेट से पास होने के बाद ये बिल राष्ट्रपति के पास भेजा गया, जहां से 24 घंटे के अंदर राष्ट्रपति ने इसपर दस्तखत कर दिए।

इनका नाम है अलख आलोक श्रीवास्तव जो पेशे से एक वकील हैं। अलख सुप्रीम कोर्ट के गोल्ड मेडलिस्ट वकील हैं। दरअसल, सरकार द्वारा लाए जाने वाले अध्यादेश के पीछे अलख आलोक श्रीवास्तव द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका है, जिसमें उन्होंने बच्चियों के बलात्कारियों को मौत की सजा देने की वकालत की थी।

श्रीवास्तव ने यह याचिका उस समय दायर किया था जब दिल्ली के 28 साल के लड़के ने अपनी ही आठ महीने की भतीजी के साथ क्रूरता से बलात्कार किया था। दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस लॉ सेंटर के गोल्ड मैडलिस्ट श्रीवास्तव ने बताया कि मैंने केस के बारे में अखबार में पढ़ा और मैं उसे देखने के लिए गया। यह एक दिल दहला देने वाला अनुभव था। उसके माता-पिता मजदूरी करते थे और उनके पास उसका इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं थे। इस तरह के अपराध में केवल मौत की सजा दी जानी चाहिए।

श्रीवास्ताव की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड को बच्ची की जांच करने और प्रशासन को निर्देश दिए कि बच्ची का सही इलाज करवाया जाए। साल 2014 में उन्होंने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड की नौकरी छोड़कर अपनी प्रैक्टिस करनी शुरू कर दी। साल 2017 में उन्होंने एक 10 साल की बच्ची का गर्भपात करवाने के लिए चंढीगढ़ जिला अदालत में याचिका दायर की थी। बच्ची का उसके ही मामा ने बलात्कार किया था। कोर्ट ने बच्ची को गर्भपात कराने की इजाजत नहीं दी क्योंकि उसकी प्रेग्नेंसी एडवांस स्टेज पर पहुंच चुकी थी।

 

हालांकि उनकी याचिका ने लोगों को ध्यान खींचा और उसका असर यह हुआ कि पैदा हुई बेटी को महाराष्ट्र के एक जोड़े ने गोद ले लिया। बच्ची के पैरेंट्स के लिए यह राहत वाली बात थी क्योंकि वह उस बच्चे को घर नहीं ले जाना चाहते थे। श्रीवास्तव की खुद दो बेटियां हैं। उन्होंने कहा कि वह खुद को बलात्कार जैसे घृणित अपराध के केस लेने से रोक नहीं पाते हैं। एक पिता के तौर पर मैं उन बच्चियों के पैरेंट्स की भावनाएं समझ सकता हूं।

 

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