संसार के समस्त रिश्तों को त्याग कर ही भगवान का चिंतन किया जा सकता है …..

संसार में मनुष्य की मानसिक स्थिति को दर्शाने वाली दो परिस्थितियां होती है पहली सांसारिक और दूसरी सन्यासी.जिस मनुष्य ने अपने चारों ओर के वातावरण में बसे सांसारिक रिश्तों को चुना, उन्हें सांसारिक ओर मोह माया में लिप्त प्राणी की संज्ञा दी गई है वही जिसने इस संसार के समस्त रिश्तों को त्याग कर भगवान का चिंतन-मनन करने का विचार किया, उन्हें अलौकिक संत की परिभाषा के रूप में कहा गया है.

वर्षों से यह कथन कहा जाता है की प्रेमी और संत हमेशा ही अधूरे होते है. पर इस समाज में पूरा होने के लिए स्वस्थ और खुश रहना पड़ता जरूरी होता है. जबकि अधूरा होना तकलीफभरा होता है. यह इसलिए ऐसा होता है क्योंकि मनुष्य के मस्तिष्क के दो भाग होते है. पहला हिस्सा शांत और सहजता लिए होता है वही दूसरे आधा हिस्सा अपने में हमेशा उथल-पुथल मचाए रहता है. मस्तिष्क का दूसरा भाग हमेशा बदला लेने की तैयारी में लगा रहता है. इस भावना से मनुष्य खुदको क्षीण, कमजोर और थका हुआ महसूस करने लगते हैं परन्तु इस सांसरिल मनोवृत्ति से खुद को आज़ाद नहीं कर पता है.

उसी प्रकार जब मनुष्य का प्रेम में अपनी सीमाओं को लांघता है तो वह सारे बंधनों को तोड़कर अपनी अलग ही मानसिकता का विकास कर लेता है जिसमे सिर्फ और सिर्फ प्रेम होता है ठीक उसी प्रकार जिस तरह एक संत के हृदय में केवल और केवल प्रभु की भावना निहित होती है.

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