सस्ते दामों के हथियार, रूस की ओर ख़िचता जा रहा है अमरीकी हथियारों का बाज़ार

अमरीका की सेंट्रल कमांड के चीफ़ जनरल जोज़ेफ़ एल वोटेल ने चेतावनी दी है कि दुनिया में अमरीका का प्रभाव सिकुड़ता जा रहा है क्योंकि अमरीका के क़रीबी घटक देश भी अमरीका के प्रतिस्पर्धियों से सस्ते दामों पर अच्छे हथियार और सैन्य उपकरण ख़रीदने में सफल हो रहे हैं।

अमरीकी मैगज़ीन ने एक विस्तृत रिपोर्ट में लिखा है कि जनरल वोटेल यह मानते हैं कि रूस और चीन इस समय अमरीका के घटकों को अपने सस्ते हथियारों और सैन्य उपकरणों की मदद से खींच रहे हैं। रूस और चीन यह हथियार इन देशों को कम क़ीमत पर देने के साथ ही सरल शर्तों और प्रक्रिया के तहत देते हैं अतः उन्हें बहुत कम अवधि में यह हथियार मिल जाते हैं।

अमरीकी जनरल का कहना है कि अमरीका की रणनीति यह है कि वह अपने घटकों के साथ मिलकर संयुक्त रूप से काम करता है और दृष्टिगत लक्ष्यों तक पहुंचने की कोशिश करता है इसके लिए वह घटक देशों के सैनिकों को प्रशिक्षण और सैन्य उपकरण देता है। इस पूरी प्रक्रिया में अमरीकी अधिकारियों की निगरानी रहती है। इस सहयोग का इसी रूप में जारी रहना अमरीका के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। अतः किसी भी देश को केवल हथियार बेचकर आज़ाद नहीं छोड़ा जाता। बहुत से देशों को अमरीका की यह रणनीति पसंद नहीं आती। इसीलिए यह देश दूसरे विकल्पों की खोज में लग गए हैं।

विशेष रूप से इस समय जब अमरीका में ट्रम्प की सरकार है अमरीका के घटकों को अच्छा बहाना मिल गया है और वह अमरीकी सरकार की नीतियों की शिकायत करते हुए आज़ादी के साथ चीन और रूस की तरफ़ बढ़ रहे हैं।

अमरीकी जनरल का कहना है कि राजनैतिक कारणों, सस्ती क़ीमत तथा हथियारों की कम समय में प्राप्ति अमरीका के घटकों को चीन और रूस की ओर खींच रही है।

मैगज़ीन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि अमरीका ने वर्ष 2017 में 5.7 अरब डालर की रक़म ख़र्च करके दुनिया की 53 सरकारों को सामरिक सहायता दी। इसमें से 150 मिलियन डालर की सहायता इराक़ को, 350 मिलियन डालर की सहायता जार्डन को और 3.1 अरब डालर का सहायता इस्राईल को दी गई। इस्राईल का मामला तो अलग है लेकिन जार्डन और इराक़ जैसे देशों को अमरीका की शर्तें स्वीकार नहीं हैं।

तुर्की और सऊदी अरब भी अमरीका के घटकों में शामिल रहे हैं। तुर्की से अमरीका के संबंध इस समय काफ़ी तनावपूर्ण हो चुके हैं लेकिन दोनों देशों के बीच दशकों पुराने स्ट्रैटेजिक संबंध रहे हैं। तुर्की ने धीरे धीरे ख़ुद को रूस और ईरान के क़रीब कर लिया और उसने रूस से एस-400 मिसाइल ढाल व्यवस्था का सौदा कर लिया।

सऊदी अरब ने भी रूस से एस-400 मिसाइल ढाल व्यवस्था का सौदा कर लिया। इन दोनों देशों का रूस से एस-400 मिसाइल ढाल व्यवस्था ख़रीदना कोई सामान्य बात नहीं है क्योंकि अमरीका इन दोनों देशों को अपने पैट्रियट मिसाइलों का बाज़ार समझता है। वैसे सऊदी अरब में स्थापित अमरीकी पैट्रियट मिसाइलों की उपयोगिता पर सवाल उठने लगे हैं क्योंकि यमन से फ़ायर किए जाने वाले मिसाइलों को पैट्रियट मिसाइल पूरी तरह नहीं रोक पा रहे हैं और यमनी मिसाइल सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ तक पहुंच रहे हैं।

अमरीका के लिए यह स्थिति बड़ी कठिन है। अगर वह अपनी शर्तों में कोई बदलाव करता है तो इसके लिए उसे देश के भीतर कठिन प्रक्रिया से गुज़रना होगा और बदलाव नहीं करता तो उसके घटक हाथ से निकल जाएंगे।

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