क्या है ट्रांजिट रिमांड, सर्च वारंट, नजरबंदी…जानें

भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में पुणे की पुलिस ने मंगलवार को देशभर के अलग-अलग ठिकानों से छापेमारी की और पांच बुद्धिजीवियों और राइट एक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार किए गए लोगों में वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंजाल्विस शामिल हैं। ये सभी लोग मानवाधिकार और अन्य मुद्दों को लेकर सरकार के आलोचक रहे हैं।
इन पर आरोप है कि वे भीमा कोरोगांव हिंसा को भड़काने में शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में इन गिरफ्तार किए गए लोगों को छह सितंबर तक हाउस अरेस्ट यानी नज़रबंद रखने के आदेश दिए हैं। गौरतलब है कि पिछले साल 31 दिसंबर को दलितों ने एक बड़ी रैली का आयोजन किया था, जो बाद में झड़प में बदल गई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। आइये जानने का प्रयास करते हैं कि शीर्ष अदालत ने सुनवाई के वक्त जिस हाउस अरेस्ट का ज़िक्र किया है वो क्या है-
अरेस्ट वॉरंट या गिरफ़्तारी के आदेश
किसी अभियुक्त को गिरफ्तार करने के लिए कोर्ट अरेस्ट वॉरंट यानि गिरफ्तारी का आदेश जारी करता है। अरेस्ट वॉरंट के तहत संपत्ति की तलाशी ली जा सकती है और उसे जब्त भी किया जा सकता है। अपराध किस तरह का है, उसके आधार पर यह जमानती और गैर-जमानती हो सकता है।

ऐसी हालत में अगर गिरफ्तार पुलिस को अपने निर्धारित क्षेत्र से बाहर करनी होती है तो उसे स्थानीय पुलिस का सहयोग लेना जरूरी है। इसके बारे में स्थानीय पुलिस थाने में लिखित ज़िक्र किया जाता है। संज्ञेय अपराध की सूरत में पुलिस अभियुक्त को बिना अरेस्ट वॉरंट के गिरफ़्तार कर सकती है। पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर अदालत में पेश करना होता है।

सर्च वॉरंट
सर्च वॉरंट वह कानूनी अधिकार है जिसके तहत पुलिस या फिर जांच एजेंसी को घर, मकान, बिल्डिंग या फिर व्यक्ति की तलाशी के आदेश दिए जाते हैं। पुलिस इसके लिए मजिस्ट्रेट या फिर जिला कोर्ट से इजाजत मांगती है। अपराध के सबूतों का पता लगाने के लिए कोर्ट से इसकी इजाजत मांगी जाती है। अपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 91, 92 और 93 के तहत जांच एजेंसी इसकी इजाजत मांगती है। अगर पुलिस अपने क्षेत्र से बाहर सर्च वॉरंट चाहती है तो उसे स्थानीय कोर्ट से संपर्क करना होता है।

हाउस अरेस्ट या नज़रबंदी
भारतीय कानून में हाउस अरेस्ट शब्द का ज़िक्र नहीं है। इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि गिरफ्तार किया गया व्यक्ति अपने घर से बाहर न निकल पाए। इसमें व्यक्ति को थाने या फिर जेल नहीं ले जाया जाता है। हाउस अरेस्ट के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति किस से बात करे, किससे नहीं, इस पर पांबदी लगाई जा सकती है। उन्हें सिर्फ घर के लोगों और अपने वकील से बातचीत की इजाजत दी जा सकती है।

ट्रांजिट रिमांड या प्रत्यर्पण की मांग
इसमें गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर अभियुक्त को संबंधित कोर्ट में पेश करना होता है। अगर गिरफ़्तारी क्षेत्र से बाहर हुई हो या फिर कोर्ट में प्रस्तुत करने में वक्त ज्यादा लग सकता है। ऐसी सूरत में स्थानीय कोर्ट में ट्रांजिट रिमांड के लिए पेशी की जाती है। सीआरपीसी की धारा 76 के मुताबिक यह जरूरी होता है। मजिस्ट्रेट कोर्ट से ट्रांजिट रिमांड मिलने के बाद ही पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को अपने क्षेत्र में ले जा सकती है।

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