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भगवान के अनुग्रह के बिना उत्तम संतान का होना कठिन,भगवान शंकर ने बताया श्रीहरि की प्राप्ति का रास्ता

शतद्रुति के गर्भ से प्राचीनबर्हि के प्रचेता नाम के दस पुत्र हुए। प्रचेतागण जब वयस्क हुए तो पिता ने उन्हें विवाह करके संतान उत्पन्न करने की आज्ञा दी। भगवान के अनुग्रह के बिना उत्तम संतान का होना कठिन है। यह सोचकर वे भगवान की प्रसन्नता के लिए तप करने के लिए पश्चिम दिशा की ओर चल दिए।

महाराज पृथु के वंश में बर्हिषद् नामक प्रसिद्ध राजा हुए। वह प्रजा का नीतिपूर्वक पालन करने वाले परम पुण्यात्मा थे। इन्होंने इतने अधिक यज्ञ किए कि सारा भूमंडल ही यज्ञमंडप बन गया। इसी से वह ‘प्राचीनबर्हि’ नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने भगवान ब्रह्मा के कहने से समुद्र की कन्या शतद्रुति से विवाह किया।

मार्ग में समुद्र के समीप उन्हें एक दिव्य सरोवर दिखाई दिया। उसमें सुंदर कमल खिले हुए थे तथा उसका जल अत्यंत निर्मल था। वहां विभिन्न वाद्यों के साथ गंधर्वों का मनोहर गान हो रहा था। अचानक प्रचेताओं ने देखा कि उस सरोवर से देवाधिदेव भगवान शंकर अपने प्रमुख गणों के साथ निकल रहे हैं। उन्हें देखकर प्रचेताओं ने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।

भगवान शंकर ने कहा, ‘‘तुम लोग राजा प्राचीनबर्हि के पुत्र हो और तुम्हारे मन में भगवान की आराधना करने की इच्छा है इसलिए मैंने तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करने के लिए ही तुम्हें दर्शन दिया है क्योंकि मुझे भगवान और उनके भक्त दोनों अधिक प्रिय हैं। अत: मैं तुम लोगों को भगवान की प्राप्ति कराने वाला एक स्तोत्र बताता हूं, इसका जप करने से तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।’’

ऐसा कह कर भगवान शंकर ने प्रचेताओं को वह पवित्र स्तोत्र बतलाया। प्रचेताओं ने समुद्र के अंदर कटि पर्यन्त जल में खड़े होकर उस पवित्र स्तोत्र का जप करते हुए दस हजार वर्षों तक तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीहरि प्रकट हुए। उन्होंने प्रचेताओं ने कहा, ‘‘हे राजपुत्रो! तुम लोग बड़े ही प्रेम से भगवदराधना रूप एक ही धर्म का आचरण कर रहे हो। तुम्हारे इस सख्य भाव से हम बहुत प्रसन्न हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन संध्या के समय तुम्हारा स्मरण करेगा उसका भ्राताओं में तथा समस्त प्राणियों में तुम्हारे ही समान प्रेम उत्पन्न होगा। तुम्हें ब्रह्मा के समान एक लोक प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न होगा जो अपनी संतानों के द्वारा इस त्रिलोकी को भर देगा।’’

भगवान के इन वाक्यों को सुनकर प्रचेतागण कृतज्ञता से भर गए। उन लोगों ने भगवान की अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए कहा, ‘‘प्रभो! हमारे लिए तो आपकी प्रसन्नता ही सब कुछ है। आपके चरणों का सान्निध्य प्राप्त हो जाने के बाद मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता। हम तो आपसे इतना ही चाहते हैं कि हम जहां भी रहें वहां आपके चरणों में भक्ति बनी रहे और आपके भक्तों का संग प्राप्त होता रहे।’’

प्रचेताओं की प्रेम भरी इस विनय को सुनकर भगवान बड़े संतुष्ट हुए और ‘तथास्तु’ कहकर अंर्तध्यान हो गए। तदनंतर प्रचेताओं ने ब्रह्मा जी के कहने से वृक्षों की दी हुई मरिषा नामक कन्या से विवाह किया। मरिषा के गर्भ से ब्रह्मा जी के मानस पुत्र दक्ष प्रजापति ने पुन: जन्म धारण किया। ब्रह्मा जी ने जब दक्ष को सृष्टि का कार्य सौंपा, तब प्रचेतागण अपनी भार्या मरिषा को पुत्र के अधीन करके वनों को चले गए और देवर्षि नारद से उपदेश लेकर भगवान के चरणों का ध्यान करते हुए भगवद्-धाम को प्राप्त हुए।

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