देशभक्ति जताती नहीं, जीती है उरी…Uri: The Surgical Strike Movie Review

फिल्म : उरी
निर्देशक – आदित्य धर
कलाकार – विक्की कौशल, परेश रावल, कृति कुल्हारी, रजित कपूर, मोहित रैना, स्वरूप संपत

स्टार- 2.5

उत्तर-पूर्व के एक जंगल से गुजरती सैनिकों से खचाखच भरी आर्मी बस। बस के अंदर अंताक्षरी की मंद-मंद आंच में तपते वर्दीधारियों के रिश्ते। किसी गीत में सजनी से छुट्टी न मिलने की सफाई तो किसी में प्रमोशन मिलते ही ढेर सारा शृंगार का सामान लाने के वादे। अचानक, सड़क पर पड़ी कुछ कीलों के टायर में धंसते ही यह सब कुछ अचानक ठिठक जाता है। कुछ ही सेकंड बाद एक बर्बर हमले में ठिठकी हुई यह बस और इसमें बैठे लोग खत्म हो जाते हैं।

सैनिकों पर होने वाले आतंकी हमलों की ओर ध्यान खींचते इस दृश्य के साथ फिल्म ‘उरी: दि सर्जिकल स्ट्राइक’ का सधा हुआ आगाज होता है। फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता एक मुस्तैद सैनिक की तरह अपने मिशन की ओर आगे बढ़ती है। बीच में कई दफा लड़खड़ाती भी है, पर दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल रहती है।

निर्देशक आदित्य धर ने सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों के आधार पर साल 2016 में हुए उरी हमले और उसकी जवाबी कार्रवाई को फिल्म की शक्ल में ढाला है। फिल्म की कहानी को चार अध्यायों के जरिये सुनाने का अंदाज प्रभावी बन पड़ा है। मणिपुर में आतंकी बस पर हमले के बाद भारतीय सेना एक मिशन के तहत भारत-म्यानमार बॉर्डर के पास इकट्ठा उत्तरपूर्व के सारे आतंकियों को मार गिराती है। इस मिशन की अगुवाई कर रहे मेजर विहान सिंह शेरगिल (विक्की कौशल) रातोंरात चर्चा में आ जाते हैं। हालांकि इस मिशन के बाद वह अपनी मां की गंभीर बीमारी के चलते रिटायरमेंट की अर्जी दे देते हैं। देश के प्रधानमंत्री (रजित कपूर) उनकी उलझन को, उनका ट्रांसफर सीमा से उनकी तैनाती हटाकर उन्हें दिल्ली के एक ऑफिस में स्थानांतरित कर दूर कर देते हैं। ताकि वह अपनी मां का ख्याल भी रख सकें और सेना की नौकरी में भी बने रहें। इस बीच उरी स्थित एक सेना के कैम्प पर हमले में कई सैनिकों सहित विहान के जीजाजी करन (मोहित रैना) भी शहीद हो जाते हैं। इस घटना से हर व्यक्ति हिल जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार गोविंद (परेश रावल) सुझाते हैं कि उरी हमले के जवाब में भारत को सर्जिकल स्ट्राइक करना चाहिए और छुपे हुए आतंकियों को उनके घर में घुस कर मारना चाहिए। आगे की कहानी सर्जिकल स्ट्राइक का विस्तार है। लुक के लिहाज से फिल्म के कुछ किरदार वर्तमान राजनीतिज्ञों से एकदम मेल खाते हैं।े

फिल्म में सबसे बड़ी राहत की बात यह रही कि इसमें देशभक्ति के चलताऊ संवाद इक्का-दुक्का ही हैं। इनकी अति इसका जायका बिगाड़ सकती थी। विक्की कौशल इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। सैनिक की वरदी के साथ वह पूरी तरह न्याय करते नजर आते हैं। विहान का किरदार न तो बहुत लाउड था, न ही इसमें अंडरप्ले करने की जरूरत थी। विक्की ने यह काम बखूबी किया। जब वह अपनी सैनिक टुकड़ी से चिल्लाकर पूछते हैं,‘हाउ इज दि जोश?’ तो जवाब में ‘हाई सर’ बोलते सैनिकों के साथ दर्शकों के जोश का पारा भी चढ़ जाता है। ‘फिल्लौरी’ और ‘वीरे दी वेडिंग’ जैसी फिल्मों में संगीत दे चुके शाश्वत सचदेव का संगीत हालांकि ऐसा नहीं है कि जुबान पर चढ़ सके, लेकिन फिल्म की गति के साथ यह सही संगत निभाता है।

और अब बात फिल्म की खामियों की। फिल्म कौतूहल नहीं पैदा करती, यह उसी राह पर चलती है, जिस पर इसके चलने की कल्पना दर्शक कर रहा होता है। इसके कुछेक घटनाक्रम इसकी विश्वसनीयता को कम करते हैं। उदाहरण के तौर पर, परेश रावल का किरदार गोविंद, मिशन की खास जरूरतों के लिए इसरो के इंटर्न के बनाए हुए एक ऐसे ड्रोन को चुनता है, जो अभी तक सुरक्षा मानकों पर पास भी नहीं हुआ है! मतलब क्या यह कोई मॉक ड्रिल चल रहा है, या देश के सबसे काबिल सैनिकों की जान इतनी सस्ती होती है? एक और बात जो अविश्वसनीय सी लगती है, वो है प्रधानमंत्री का, विहान की अल्जाइमर (आखिरी स्टेज)  से पीड़ित मां की देखभाल के लिए एक खूफिया अधिकारी पल्लवी शर्मा (यामी गौतम) को नर्स के रूप में नियुक्त करना। एक गंभीर खूफिया मिशन से जुड़ी फिल्म में इस किस्म की खामियां अखरती हैं। फिल्म में यामी के अलावा कीर्ति कुल्हारी भी हैं और अपनी भाव-भंगिमाओं के जरिये वह यामी से कहीं ज्यादा सहज और विश्वसनीय लगी हैं। मोहित रैना अपने छोटे से किरदार में प्रभावित करते हैं, उनका स्क्रीन प्रेजेंस शानदार है। मोहित की बेटी बनी बाल कलाकार जब अपने पिता की शहादत के बाद उनका सिखाया हुआ ‘वॉर क्राई’ (सैनिकों में जोश भरने वाला खास स्लोगन) बोलती है, तो रोंगटे खड़े होते हैं। खामियों के साथ ही सही, पर यह फिल्म दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल रहती है।

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