Last Special : अटल ने यूपी को बनाया अपना राजनीतिक कर्मभूमि

अटल बिहारी वाजपेयी की उपलब्धियां कम नहीं हैं। गिनाने का सिलसिला शुरू हो तो रुकने का नाम न ले…। जी हां…, अटल के नाम ऐसी उपलब्धियां हैं जो बहुत कम नेताओं को मिली। अटल चार राज्यों के छह लोकसभा सीटों से जीतकर सांसद पहुंचने वाले पहले नेता बने।
अटल का नाता उत्तर प्रदेश से काफी पुराना है। यहां के लोग उन्हें ऐसे ही याद नहीं करते हैं। इसकी भी खास वजह रही…। अटल जी पैदा भले ही मध्य प्रदेश में हुए, लेकिन राजनीतिक कर्मभूमि उन्होंने उत्तर प्रदेश को ही बनाया। यहीं से वह चुनाव जीते और देश के प्रधानमंत्री बने। यह बात अलग है कि यूपी वालों ने जहां उन्हें सिर माथे पर बिठाया वहीं उन्हें हार का भी स्वाद चखना पड़ा। संघ ने उन्हें 1957 में यूपी की तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। लखनऊ में वो चुनाव हार गए तो मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई, लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो लोकसभा में पहुंचे।

बताते हैं कि उन्होंने जनता से सीधे संवाद कर पूछा कि ऐसी कौन सी वजह रही कि उन्हें क्यों हार का सामना करना पड़ा। शायद ही वजह रही कि बलरामपुर की जनता ने एक बार उन्हें फिर हाथों हाथ लिया और भारी मतों से विजयी बनाया। अटल जी ने इसी बलरामपुर सीट से 1967 में फिर जीते।
अटल जी यूपी के बाद 1971 में मध्य प्रदेश की ग्वालियर सीट से चुनाव लड़े और जीते। यहां से जीत के बाद वह 1977 और 1980 में दिल्ली से चुनाव जीते। देश की राजधानी से दो बार सांसद चुने जाने के बाद अटल जी ने एक बार फिर मध्य प्रदेश का रुख किया और 1984 में ग्वालियर से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस हार का नतीजा यह रहा कि उन्होंने 1991 में लखनऊ और विदिशा दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत दर्ज की। बाद में विदिशा संसदीय सीट छोड़कर लखनऊ अपने पास रखी।
अटल जी ने इसके बाद लखनऊ संसदीय सीट को ही अपनी स्थाई सीट बना ली। लखनऊ से 1996, 1998, 1994 और 2004 में जीत दर्ज की। अटल जी ने वर्ष 2009 में स्वास्थ्य कारणों के चलते चुनाव लड़ना बंद किया और लखनऊ की सीट उनके करीबी माने जाने वाले लालजी टंडन को दे दी गई। लालजी टंडन चुनाव लड़े और जीते भी। राजनीतिक जीवन में अटल का लखनऊ से भारी लगाव रहा है। यहां के चौराहों और मुहल्लों में उन्होंने खूब सभाएं कीं।

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