एक ऐसा शहर जिस पर अटल बिहारी ने खूब बरसाया प्यार

लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी का नाता तो बहुत पुराना रहा। यहां से वह केवल सांसद भर नहीं थे। इस शहर में उन्होंने सिनेमा भी देखा तो चाट व कुल्फी भी खाई और गंजिंग भी की। पानदरीबा, अमीनाबाद का झंडेवाला पार्क, राजेंद्र नगर का संघ का कार्यालय, चौक की गलियां में उनकी आवाजाही रही। लखनऊ का वीवीआईपी गेस्ट हाउस उनके रौद्र रूप का गवाह बना जब उन्होंने वह तत्कालीन गवर्नर रोमेश भंडारी द्वारा कल्याण सरकार बर्खास्त किय जाने के विरोध में धरने पर बैठे।

तीन जगह से लड़े एक जगह से हारे : 
1951 में वो भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे. अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने रंग जमा दिया।  लखनऊ में एक लोकसभा उप चुनाव में वो हार गए थे।1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया।  लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई। लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे।

यूं रहा अटल का सफर : 
ग्वालियर के एक नम्निमध्यवर्गीय परिवार में 25 दिसंबर 1924 को जन्मे अटल बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। वह वहां के वक्टिोरिया कालेज में पढ़े और उसके बाद कानपुर के डीएवी कालेज में पढ़े। उन्होंने राजनीतिक वज्ञिान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में रुझान दिखा और उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन अखबार से जुड़ कर संपादन किया। आजीवन अविवाहित रह कर उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के तौर पर शुरू किया और और गठबंधन की राजनीति को नई दिशा देते हुए 24 दलों की  राजग सरकार चलाकर अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया।

अटल बिहारी वाजपेयी ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के मार्गदर्शन में राजनीति का पाठ पढ़ा समझा। जनसंघ के संस्थापक सदस्य रहे अटल के बारे में कितने सोचा होगा कि वह देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। उन्होंने बतौर विदेशमंत्री संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण दिया। छह अप्रैल 1980 को जब  भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तो अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष बने। उन्हें अपने ही नगर ग्वालियर से लोकसभा चुनाव हारना पड़ा। तीन बार प्रधानमंत्री रहे और 2004 के लोकसभा चुनाव में उनका शाइनिंग इंडिया नारा कामयाब नहीं रहा और यूपीए सरकार सत्ता में लौटी । इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी बीमारी की गिरफ्त में आने लगे और सियासत से दूर अकेले एक छोटे से बंगले में सीमित हो गए। उन्हें भूलने की बीमारी ने घेरना शुरू कर दिया और एक वक्त ऐसा भी आया कि एक सशक्त अटल असहाय अटल के रूप में सामने आये। जब भाजपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब अटल इस गौरवमय क्षण का आनंद लेने की स्थिति में नहीं थे।

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